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Thursday, June 20, 2013

मुर्शिदाबाद में जैन साधू एवं यति गण


मुर्शिदाबाद में जैन समुदाय अत्यंत धार्मिक एवं समृद्ध था। अतः विभिन्न गच्छों के साधू, साध्वी एवं यति गण यहाँ पधारते रहते थे। कुछ यति तो यहाँ स्थाई रूप से भी रहते थे।

मुर्शिदाबाद आकर बसने वालों में जगत सेठ सर्व प्रथम थे। वे पायचन्न (पार्श्वचंद्र ) गच्छ के थे। उनके समय में पायचन्न गच्छ के साधुओं एवं यातियों का आगमन मुर्शिदाबाद में होता रहता था। बाद में अधिकांशतः खरतर गच्छ एवं तपागच्छ के साधू सध्विओं एवं यतिओ का ही पदार्पण यहाँ होता रहा है. इनमे से कई बड़े विद्वान् भी थे एवं उनलोगों ने अनेक  रचनाएँ यहाँ पर रह कर की है.

तपागच्छ के महान आचार्य आत्माराम जी महाराज के प्रमुख शिष्य श्री कमल सूरी जी ने लगभग सौ वर्ष पूर्व अजीमगंज चातुर्मास किया था। राय बुध सिंह दुधोडिया परिवार ने उस चातुर्मास का लाभ लिया था। इसी प्रकार खरतर गच्छ के गणाधीश श्री सुखसागर जी महाराज के शिष्य श्री हरीसागर जी महाराज को अजीमगंज श्री संघ ने आचार्य पद प्रदान कर उनका चातुर्मास यहीं करवाया था. उसके बाद लम्बे समय तक यहाँ कोई चातुर्मास नहीं हुआ। नब्बे के दशक में फिर से यह सिलसिला चालू हुआ एवं जियागंज के दुगड़ परिवार की बेटी साध्वी श्री चारुयशा श्री जी का चातुर्मास अजीमगंज में हुआ। उसके बाद साध्वी हेम प्रज्ञा श्री जी का अजीमगंज एवं उनकी छोटी गुरु बहनों का जियागंज एक साथ चातुर्मास हुआ। उसके बाद अजीमगंज के ही सपूत आचार्य श्री  पद्मसागर सूरी जी एवं साध्वी श्री शशिप्रभा श्री जी का चातुर्मास भी अजीमगंज में हुआ.

यद्यपि यहाँ साधू सध्विओं का चातुर्मास होता रहा है परन्तु शहरवाली समाज मुख्य रूप से यतिओ पर ही निर्भर रहा। बीकानेर के श्रीपूज्यजी की यहाँ बड़ी मान्यता थी। बीकानेर की बड़ी गद्दी से संपर्क जिन सौभाग्य सूरी के समय से ही प्रारंभ हो गया था। बाद में यह संपर्क इतना दृढ हो गया की बीकानेर की गद्दी में बैठने के बाद श्रीपूज्यों का चातुर्मास अजीमगंज से ही प्रारंभ होता था।  यह व्यवस्था आज तक प्रचलित है। श्री जिन चारित्र सूरी, जिन विजयेन्द्र सूरी, एवं जिन चन्द्र सूरी के अनेक चातुर्मास यहाँ पर हुए।

इसके अतिरिक्त बीकानेर गद्दी के एक आदेशी यति यहाँ पर हमेशा रहते थे एवं धार्मिक क्रियायों के साथ यहाँ की समाज व्यवस्था को सुचारू रूप से चलने में योगदान देते थे। अजीमगंज में श्री लक्ष्मीचंद जी यति एवं जियागंज में श्री प्यारेचंद जी यति को मैंने भी देखा है। बीकानेर के आदेशी यतियों के अलावा अन्य यति गण भी यहाँ रहते थे। संस्कृत भाषा के प्रकांड विद्वान् महा महोपाध्याय श्री हेमचंद जी एवं उनके शिष्य प्रशिष्य श्री करमचंद जी व किर्तिचंद जी अजीमगंज में आजीवन रहे. आपलोग विजय गच्छ के थे एवं कोटा गद्दी से संवंधित थे। इसके अतिरिक्त अजीमगंज में यति मोतीचंद जी एवं यति ज्ञानचंद जी भी स्थाई रूप से निवास करते थे।

श्रावकों में लोंका गच्छ के अनुयायियों की  संख्या अधिक होने पर भी कभी किसी लोंका गच्छ के यति यहाँ पधारे ऐसा सुनने में नहीं आया है.

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Thursday, December 17, 2009

अजीमगंज श्री नेमी नाथ स्वामी स्तवन

जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक समुदाय के खरतर गच्छ परम्परा में, श्री सुख सागर सूरी के समुदाय में पूज्य श्री हरी सागर सूरी  आचार्य बने. उन्हें अजीमगंज में महोत्सव पूर्वक आचार्य पद प्रदान किया गया. उस समय अजीमगंज श्री नेमी नाथ स्वामी के मंदिर में अस्टान्हिका  (अट्ठाई) महोत्सव का आयोजन किया गया. उस अवसर पर मंदिर की शोभा का वर्णन करते हुए श्री जगन्नाथ पटावरी ने एक स्तवन लिखा था. यह स्तवन स्तवनावली एवं प्रभु भजनावली में भी मुद्रित है. यह भजन एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी है.
स्तवन


उत्सव की आई बहार,  बहार मेरे प्यारे, उत्सव की आई बहार. 
मंगलमय धन बंगाल देशे,  अजीमगंज उदार,  उदार मेरे प्यारे, उत्सव की आई बहार. १
नेमी प्रभु जिन मंदिर सुन्दर,  देव विमान आकार,  आकार मेरे प्यारे....  २
भाविक भक्त जन पूजा रचावे,  आठ अनेक प्रकार,  प्रकार मेरे प्यारे ..३.
भाव नन्दीश्वर तीरथ राजे, पावापुरी है श्रीकार, श्रीकर मेरे प्यारे ...४
चम्पापुरी वर तीरथ अष्टापद, भव जल से तारनहार, हार मेरे प्यारे... .5
सम्मेत शिखर समवशरण की, रचना है आनंद्कार, कार मेरे प्यारे..६.
पूज्य हरी सागर सूरी पदोत्सव, संघ रचावे जयकार,  कार मेरे प्यारे ...७
साधर्मी आवे देश देश के, दर्शन वंदन कार, कार मेरे प्यारे...८
स्वर्ग निवासी देव देवी गण, आने को उत्सुक अपार, अपार  मेरे प्यारे...९
गंगा नदी जल धारा ले आवे, पाप पखालन हार, हार मेरे प्यारे...१० 
जगन्नाथ प्रभु पुण्य कृपाते, घर घर मंगलाचार, चार मेरे प्यारे...११

क्षमाकल्याण जी रचित अजीमगंज नेमिनाथ प्राचीन स्तवन 
अजीमगंज में पूजा
सत्रह भेदी पूजा
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