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Monday, June 27, 2016

रंजन नाहर, अजय बोथरा एवं रविन्द्र श्रीमाल कोलकाता बड़े मंदिर में चुने गए


कल २६ जून रविवार, कोलकाता तुलापट्टी स्थित बड़े मंदिर के चुनाव २०१६ में शहरवाली समाज के लोगों ने सफलता हासिल की है. कुल सात ट्रस्टियों में से शहरवाली समाज से तीन,  रंजन नाहर, अजय बोथरा एवं रविन्द्र श्रीमाल ट्रस्टी के रूप में निर्वाचित हुए हैं। सामान्य परंपरा ये रही है की  शहरवाली साथ से २, जौहरी साथ से २ एवं मारवाड़ी साथ से ३ ट्रस्टी चुने जाते हैं. परन्तु यह केवल परंपरा है कोई नियम नहीं।

शहरवाली साथ के  रंजन नाहर, अजय बोथरा एवं रविन्द्र श्रीमाल के अलावा जौहरी साथ के नरेंद्र पर्सन एवं सुशिल रायसुराणा एवं मारवाड़ी साथ के थानमल बोथरा व कमल सिंह रामपुरिया कोलकाता बड़े मंदिर में ट्रस्टी के रूप में चुने गए.

उल्लेखनीय तथ्य ये है की कई दिग्गज भी इस चुनाव में हार गए जिनमे से अखिल भारतीय खरतर गच्छ महासंघ के संस्थापक सदस्य ज्ञानचंद लुनावत एवं महासंघ के पूर्व अध्यक्ष पदमचंद नाहटा जैसे लोग भी सम्मिलित हैं. ये दोनों ही महानुभाव मारवाड़ी साथ के हैं.

इस चुनाव में जोहरी साथ के केवल दो ही व्यक्ति खड़े हुए थे और दोनों ने ही जीत दर्ज़ की जबकि शहरवाली समाज के चार में से तीन. मारवाड़ी साथ से ७-८ लोग खड़े हुए थे परन्तु केवल २ ही जीत पाए.

सभी ७ निर्वाचित प्रतिनिधियों को बहुत बहुत वधाई देते हुए यह आशा करता हूँ की ये सभी लोग मंदिर की व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाते हुए जिन शासन की प्रभावना करते रहेंगे।

Jyoti Kothari
(Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur, representing Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is a Non-resident Azimganjite.) 

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Friday, June 26, 2015

शहरवाली समाज को जोड़ें मुर्शिदाबाद के जैन

श्री सम्भवनाथ मंदिर, अजीमगंज

 मुर्शिदाबाद खास कर अजीमगंज एवं जियागंज के श्वेताम्बर जैन (ओसवाल) शहरवाली समाज के रूप में दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं.  नवाब मुर्शीद कुली खां के समय से ही यहाँ का वैभव, संस्कृति, धर्मनिष्ठा पुरे भारत में अनुकरणीय रही है. कालक्रम से इन शहरों का वैभव भी नष्ट हुआ एवं १९५४ के जमींदारी उन्मूलन कानून के बाद यहाँ का शहरवाली समाज मुर्शिदाबाद छोड़ कर जाने को मज़बूर होने लगा. आज इन दोनो शहरों अजीमगंज व जियागंज का वैभव खंडहरों में बस कर नामशेष रह गया है।

आज इस समाज के अधिकांश लोग इन दोनों शहरों से बाहर रहने लगे हैं. ख़ुशी की बात ये है शहरवाली समाज के लोग विश्व के भिन्न भिन्न स्थानो में रहते हुए वहां पर भी अपनी छाप छोड़ रहे हैं. आज भी शहरवाली समाज का अधिकांश भाग कोलकाता शहर में रहता है परन्तु अन्य स्थानो में रहने वालों की भी कोई कमी नहीं है. मैंने इस ब्लॉग के माध्यम से उन लोगों को जोड़ने का एक छोटा सा प्रयास किया है और विभिन्न स्थानो में रहनेवाले समाज के लोगों का स्थानवार विवरण भी दिया है।  परन्तु यह प्रयास अभी अधूरा है और अभी भी ऐसे लोग बहुत हैं जिनके बारे में मुझे पता नहीं होने से उनके बारे में लिखना संभव नहीं हो सका है।

अतः आप सभी से निवेदन है की इस सम्वन्ध में आपको कोई भी जानकारी हो तो मुझे देने की कृपा करें जिससे उन्हें भी इस ब्लॉग के माध्यम से जोड़ा जा सके. आपका यह सहयोग पुरे समाज को जोड़े रखने में सहायक होगा। इसके साथ ही शहरवाली समाज की ऐतिहासिक सामग्री, फोटो, दस्तावेज एवं समाचार भी भेजने का कष्ट करें जिससे इस ब्लॉग को पढ़नेवालों तक यह जानकारी पहुंच सके.

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Tuesday, May 28, 2013

शहरवाली समाज के सम्वन्ध में पुस्तक के प्रस्तावित अध्याय


आप सभी जानते हैं की मुर्शिदाबाद के शहरवाली समाज के सम्वन्ध में मैं एक पुस्तक लिख रहा हूँ। इस समय मैं इस पुस्तक में लिखे जाने वाले विभिन्न अध्यायों के वारे में विचार कर रहा हूँ। यह किताब सभी के लिए उपयोगी हो सके इसलिए मैंने इसमें निम्नलिखित अध्यायों की परिकल्पना की है। इस कार्य में जैन शोध एवं अध्ययन संस्थान, जयपुर के डा शिवप्रसाद जी का मुझे पूरा सहयोग मिल रहा है.

१ बंगाल में जैन धर्म
२ मुर्शिदाबाद का ऐतिहासिक विवरण
३ शहरवाली समाज एवं संस्कृति
४ प्रसिद्द परिवार एवं व्यक्ति
५ रीति रिवाज़ एवं धार्मिक मान्यताएं
६ मंदिर, दादाबाड़ी एवं अन्य धार्मिक स्थल
७ स्कूल, कोलेज, अस्पताल एवं अन्य सार्वजनिक स्थल
८ शहरवाली समाज का वैभव
९ समग्र जैन समाज को शहरवाली समाज का योगदान
१० नवपद ओली एवं मंडलजी की पूजा
११ शहरवाली समाज का वर्त्तमान व भविष्य


पुस्तक तैयार होने तक इसमें अनेक परिवर्तन संभावित है।  आप के सुझाव इस लेखन को और भी अच्छा बना सकते है। आप सभी के सुझाव एवं सामग्री की मैं व्यग्रता से प्रतीक्षा कर रहा हूँ।


मुर्शिदाबाद शहरवाली समाज की ऐतिहासिक सामग्री



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Sunday, December 9, 2012

शहरवाली समाज में तास पत्ति का खेल


 अजीमगंज जियागंज  के शहरवाली समाज में तास पत्ति का खेल बहुत प्रचलित था। औरत व मर्द दोनों ही तास खेलने के शौक़ीन होते थे। बच्छे लोग भी खेलते थे। बहुत से लोग रोज़ खेलते थे तो कुछ लोग सिर्फ दिवाली को। जब मुर्शिदाबाद से लोग कलकत्ता और दूसरी जगह चले गए तब भी बहुत से लोगों में यह शौक बरक़रार रहा। कुछ शौक़ीन लोग तो तास खेलने के लिए ही छुट्टी के दिनों में अजीमगंज या जियागंज आ जाते थे।

शहरवाली  समाज में तास के साथ नकश का खेल भी बहुत पहले खेला जाता था जो तास के जैसा ही होता है। ये खेल मैंने कभी देखा नहीं पर सुना जरूर है। तास में रमी, तीन पत्ति का उपयोग जुआ खेलने में होता था। घर में शौक सेबगैरह खेला जाता था। आठ तास से खेला जाने वाला रमी वहां पर रूबी कहलाता था जिसे ज्यादातर बच्छे और औरतें खेलती थीं। इसके अलावा स्वीप, कतली का छक्का, ब्रीज बगैरह भी खेलते थे। एक बहुत ही मजेदार खेल होता थ "Bray". इस खेल को वहां बीबी धसानी बोलते थे।

आज से 30-35 साल पहले कुछ नए खेल भी इस सूचि में जुड़ गए थे जैसे कनास्ता, लिम्का, टनाला, 21 तास बगैरह। ये सभी खेल रमी का ही दूसरा रूप था।

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Tuesday, January 31, 2012

शहरवाली शब्दकोश (शब्दावली) Murshidabad Dictionary


 शहरवाली समाज की अपनी अलग ही बोली थी. यह बोली बड़ी मीठी लगती है. यह बोली हिंदी, मारवाड़ी, उर्दू, बंगाली एवं अंग्रेजी भाषा का मिलाजुला रूप है. इसमें कहीं हिंदी का शब्द व बंगाली का व्याकरण है तो कहीं उर्दू शब्दों को हिंदी के व्याकरण में डाला गया है. कहीं कहीं इस बोली ने अपने आपको अपने ही अंदाज़ में विकसित किया है.  शहरवाली समाज को ठीक तरह से जानने के लिए इसकी बोली को जानना जरुरी है. यहाँ पर कुछ शहरवाली बोली के शब्द हिंदी अर्थ के साथ दिया जा रहा है. 

Murshidabad Dictionary
शब्दकोश (शब्दावली) 
इ पार : इस पार 
ऊ पार: उस पार 
चपना : चढ़ना 
नमना :  उतरना
जाङ : जायेंगे, जाउंगा
आमङ : आऊंगा, आयेंगे
खाङ: खाऊंगा
सुतना: सोना
बिलायती मिटटी: सीमेंट
हम    : मैं
हमलोग : हम 
नउका : नाव 
खाने का : मिठाई, नमकीन 
ड्योंठा: मठरी 
कलाई : उड़द 
हूँआँ : वहां 
हिंयां : यहाँ
चट्टी : चप्पल
बूट : चना
कद्दू: घिया
बंटा: कटोरदान
गमला: तसला
नाली: पानी की झारी
सपरिआम: अमरुद
कौंला : संतरा
बोड़: बेर
शरीफा: सीताफल
तरकारी: सब्जी
बीबीजी: ननद
बाईजी:  मिश्रानी
करछुल: करछी
चिमचा: चम्मच
बेशी (बहुत)
ओदा खोदा (कुरेदना)
उल्लोग (उनलोग)
 बी (भी)
 नई (नहीं)
 उत्ता (उतना)
टुकु (सा)
खाइस (खाया)
बैङ्गि (पानी भरने के लिए कनस्तर ले जाने का डंडा)
गोरु (गाय)
घांस (घास)
पाखी (चिड़िया)
दीजो (दे देना).
सझला (तीसरा)
फुच्ची (छठा)
नन्हा फुच्ची (सातवां) भाई
जात्रा (यात्रा)  गिया (गया)
सिरि (श्री)
 पुजजी (पूज्यजी)
 म्हाराज (महाराज)
पुषाल (पौषाल, उपाश्रय)
 हुवाँ (वहां)
 भौत (बहुत)
रहें (रहते हैं).
छक्का पंजा (मायाचारी, कपट)
बोलके (इसलिए)
भिड़ने (लड़ने)
नइ (नहीं)
मांगे (मांगता है).
इत्ता (इतना)
सट सट (नज़दीक-नज़दीक)
न्हलइयो (नहलाना)
 मु (मुँह)
बदली (बादल)
रक्खीस (रखा)
गुमस (उमस)
आंग (शरीर)
हात (हाथ)
दरद (दर्द)
होये (होता है)
कबराज (कविराज-वैद्य)
गोटे (पुरे)
बदन (शरीर)
कादा (कीचड़)
माख (मल)
चाँई-मुलाइन (सब्ज़ी बेचनेवाली जाती विशेष)
तरकारी (सब्जी)
अइयो (आना)
तरे (तरह)
खुदी जाम (जामुन की जंगली जाति, छोटा होता है)
दागरेज़ी (मरम्मत)
पायेट (मज़दूर)
सुरकी (सुर्खी)
हात (हाथ)
पुचारा (पुताई)
सर्भाव (सभी का) जीमण
अदराने (इतराने)
बोली फूटने (बोलने)
सोजा सोजी (सीधे सीधे)
इत्ता (इतना)
कडबेल (कपीठ)
पाचक (चूर्ण)
नेचु (लीची)
छाते (कमलगट्टा)
गंडा (चार)
लड़काबाला (बच्चे) लोग
उधिर (उधर)
उ (उस)
रस्ते (रास्ते)
पिच्छल (फिसलन)
गोटे (पुरे)
आंग (शरीर)
क़ादा (कीचड)
मख (लग)
बाज़ी (शर्त)
लगाइस (लगाया)
बग़ान (बगीचा)
नरंगी (नारंगी)
गाछ (पेड़)
पोतीस (रोपा)
ढेला (पत्थर या ईंट का टुकड़ा)
बड़े लोग (वयस्क)
रा (रहा)
कतली (ईंट- तास के खेल में)
झबड़े (हुकुम)
टिक्का (इक्का)
साहेब (बादशाह)
बीबी (बेगम)
माझी (नाविक)
नउका (नाव)
हेलना  (तैरना)
गल्ली (गली)
झड़ी-पानी (बरसात)
मेघ (बादल)
ढेउ (तरंग)
अक्खय (अक्षय)
मौच्छव् (महोत्सव- वरघोड़ा)
अइयो (आना).
घाउ (घाव)
नापित (नाइ)
नैड़ा (गंजा)
कबीला (विधवा)
चांदा (चन्दा)
छमछरी (संवत्सरी)
पड़कौना (प्रतिक्रमण)
उ (वह)
 इंरेजि (अंग्रेजी)
बई (किताब)
पढ़े (पढ़ रहा)
हे (है).
बाबाजी (ताऊजी)
सूत (सो)
तामे (ताम्बे)
ततैड़े (टंकी या कढ़ाई)

शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की बोली भाग


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रीति रिवाज़: मृत्यु एवं शोक


मृत्यु एवं शोक जीवन की एक अभिन्न प्रक्रिया है जिसे कोई नहीं चाहता परन्तु यह अवश्यम्भावी है. मुर्शिदाबाद के शहरवाली समाज में मृत्यु एवं शोक के  अपने  रीति रिवाज़ हैं. 

किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर पहले उसे स्नान करवा कर अर्थी में उसी प्रकार ले जाया जाता है जैसे अन्य सभी स्थानों पर.  स्मशान में मृत देह को जलने के तत्काल बाद उसे ठंडा कर दिय्स जाता है एवं अश्थी व अवशेषों को वही गंगा में प्रवाहित किया जाता है. मृत्यु के बाद जहाँ मृत देहको लेटाया गया था वहां सर के स्थान पर आटे से गोला बनाया जाता है एवं उस पर थाली ढक कर वहां दीपक जला दिया जाता है. बाद में थाली उठा कर आटे पर बना निशान देखा जाता है. ऐसा मन जाता है की आटे पर बना निशाण अगली गति की सुचना देता है. 
मृत्यु के तीसरे दिन उठावना होता है. उठावने में पहले सब लोग घर पर इकठ्ठा होते हैं उसके बाद सब मिलकर मंदिर व पौशाल जाते हैं. वहां पर यति जी या कोई श्रावक शांति का पाठ करते हैं. फिर सब लोग घर लौट आटे हैं. 

पांचवें या सातवें दिन ठंडा बार देख कर न्हावन  किया जाता है. उसमे घर के सब लोग नाख़ून, बाल बगैरह कटवाते हैं, घर की पूरी धुलाई होती है एवं नहा कर सब मंदिर जाते हैं.

१२ दिन तक शोक रखा जाता है एवं समाज के लोग बैठने आत़े हैं. शोक के समय घर वाले सर पर पल्ला लेते हैं. औरतें गुलाबी साड़ी पहनती है. बैठने आने वाली समाज की औरतें भी गुलाबी साड़ी पहन कर आती है. 

शोक निवारण के लिए पगड़ी बदलाई व वेश पलटाई होती है. लड़के के सुसराल वाले पगड़ी व वेश बदलवाते हैं. १३ वें दिन मंदिर में बारह व्रत की पूजा पढ़ाई जाती है.  आम तौर पर मृयु भोज नहीं होता है एवं शोक के समय किसी प्रकार का लें दें भी नहीं होता. यह शहरवाली समाज की एक बहुत अच्छी प्रथा है.

शोक के बारह दिन तक समाज के सब घरों से खाना भेजा जाता है और घर के एवेम बहार से आने वाले लोग वही खाते हैं. पहले तो १२ दिन तक घर में चूल्हा भी नहीं जलता था. मृत्यु के समय जहाँ अन्य सभी स्थानों व समाजों में मरनेवाले के ऊपर सब को खिलाने पिलाने व दें लें का बोझ पड़ता है वहीँ शहरवाली समाज में समाज के लोग उस परिवार के खाने पीने का इंतजाम करते हैं. ये एक बहुत ही अच्छी प्रथा है एवं इसका अनुकरण अन्य समाजों द्वारा भी किया जाना चाहिए.



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Tuesday, January 12, 2010

अजय बोथरा एवं रविन्द्र श्रीमाल तुलापट्टी, पंचायती मंदिर कोलकाता के लिए निर्वाचित

मुर्शिदाबाद शहरवाली समाज के श्री अजय बोथरा एवं श्री रविन्द्र श्रीमाल तुलापट्टी, पंचायती मंदिर, कोलकाता के लिए हुए चुनाव में निर्वाचित हुए हैं. ये दोनों ही अजीमगंज के हैं एवं वर्त्तमान में कोलकाता में रहते हैं. श्री अजय बोथरा श्रीचंद जी बोथरा के पौत्र एवं श्री रविन्द्र श्रीमाल श्री कांतिलाल जी श्रीमाल के पुत्र हैं. 
वधाई!  
यह चुनाव १० जनवरी को जैन भवन में संपन्न हुआ. जैन समाज के लगभग ११०० लोगों से इस मतदान में भाग लिया.शहरवाली समाज के कुल चार लोगों ने इस निर्वाचन में भाग लिया था जिनमे से दो चुने गए.

श्री शांतिनाथ स्वामी पंचायती मंदिर, तुलापट्टी, कोलकाता में परंपरागत रूप से दो सदस्य शहरवाली समाज से, दो सदस्य जौहरी साथ से एवं तीन  सदस्य कोलकाता मारवाड़ी साथ से चुने जाते हैं. इस वार भी उसी के अनुरूप चुने गए हैं.

विमल महमवाल एवं राजकुमार बोथरा जौहरी साथ से निर्वाचित 
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Saturday, September 5, 2009

अजीमगंज दादाबाडी में भैरव जी का उत्थापन

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स्फटिक चरण


उत्थापन कार्यक्रम में उपस्थित जनसमूह


अजीमगंज रामबाग दादाबाडी में भैरव जी के उत्थापन का कार्यक्रम दिनांक २ सितम्बर २००९, वुधवार को पूज्या साध्वी श्री शशिप्रभा श्री जी महाराज की निश्रा में सम्पन्न हुआ। इसके साथ ही प्राचीन दादाबाडी को तोड़ने काम भी शुरू हुआ। ज्ञातव्य है की इस अति प्राचीन दादाबाडी को पुरी तरह जमींदोज कर (सिर्फ़ मूल वेदी को छोड़ कर) नए सिरे से निर्माण कराया जायेगा। यह कार्यक्रम काफी बड़ी लागत से सम्पन्न होगा। इस काम को करवाने के लिए अजीमगंज श्री संघ के सचिव श्री सुनील चोरडिया काफी लगन के साथ परिश्रम कर रहे हैं।

इस दादाबाडी में तीन दादागुरुओं के साथ ही पंचम काल के अंत में होने वाले अन्तिम युगप्रधान आचार्य श्री दुप्पह सूरी के भी चरण हैं। ये चारों नयनाभिराम चरण स्फटिक रत्न से बने हुए हैं।

इस काम के संवंध में शहरवाली समाज में एक मत नहीं है। जहाँ कुछ लोग यह काम करवाना चाहते हैं वहीँ बड़ी संख्या में लोग इस के विरोध में भी हैं। विरोधी लोगों का मत है की दादाबाडी का सामान्य रूप से जीर्णोद्धार करवाना ही काफी है। अब अजीमगंज में बहुत कम लोग रहते हैं। दादाबाडी शहर से दूर होने के कारण बहुत कम लोग ही वहां पहुचते हैं। ऐसी स्थिति में इस जगह पर इतना पैसा लगाने का औचित्य नहीं है। उनका मानना है की इस पैसे का बेहतर उपयोग हो सकता है।

रामबाग परिसर में दो तालाव भी है। अभी कुछ दिन पूर्व किसी वास्तुकार ने सलाह दी की इन्हे बंद करवा दिया जाए। इस बात को ले कर भी गहरे मत भेद है। कुछ लोग इस सलाह पर अमल करना चाहते हैं लेकिन कुछ लोगों का मानना है की इसमे बहुत अधिक जीव हिंसा होगी जो की जैन सिद्धांत के ख़िलाफ़ है। साथ ही तालाव बंद करवाना राज्य के कानून के भी ख़िलाफ़ है। लोगों का यह भी कहना है की जिस समय यह तालाव बना था तब अजीमगंज बहुत समृद्ध था तो फिर इसमें वास्तु दोष कैसे हो सकता है?
जैन धर्म की मूल भावना भाग 1
जैन धर्म की मूल भावना भाग 2


दादाबाडी का प्राचीन चित्र
सौजन्य बिकास छाजेड
प्रस्तुति:
ज्योति कोठारी


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Monday, March 30, 2009

रीति रिवाज़: खीर चटाई व मुंडन

 शहरवाली समाज में अन्नप्राशन  को खीर चटाई कहते थे. इस के अपने रीति रिवाज़ थे.

बच्चा अन्न खाने लायक होता था तब शुभ मुहूर्त में चांदी के कटोरे चम्मच से खीर चटाई करवाते थे। चांदी शुभ माना जाता है और स्वास्थ्यप्रद भी है। उससे पहले कोई अन्न बच्चे को नही देते थे। खीर चटाई के उपलक्ष्य में कार्यक्रम होता था। खीर चटाई भुआ करवाती थी।

मुंडन: तीसरे या पांचवें साल में बच्चे का मुंडन होता था। उस समय बाजे के साथ बच्चे को लेकर कुलदेवता, भैरव जी, माता जी आदि (जिनके घर का जो रिवाज़ हो) के यहाँ ले जा कर मुंडन करवाते थे वहां तेल सिन्दूर आदि चढाया जाता था। बच्चे को मन्दिर दर्शन करवा कर गुरु जी के पास बासक्षेप डलवाते थे और बच्चे को अक्षर ज्ञान करवाते थे। उस समय यती जी को ही गुरु जी कहा जाता था। यतीजी स्लेट में पेंसिल से ॐ नमो सिद्धं लिखवाते थे। मुंडन का विशेष महत्वा था और उस समय ख़ास उत्सव होता था। 


रीति रिवाज़: सिलामी और व्याह भाग २ 
ज्योति कोठारी 

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