Thursday, January 3, 2013

दादागुरु पूजा के रचयिता राम ऋद्धिसार जियागंज के थे

 दादागुरुदेव की पूजा के रचयिता श्री रामलाल गणी उपनाम राम ऋद्धिसार का जन्म जियागंज  एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। परिस्थितिवश वे बीकानेर पहुच गए एवं वहां पर यति दीक्षा ग्रहण की। अपनी प्रतिभा, लगन एवं सुदीर्घ अभ्यास से वे जैन अगमो के विशिष्ट अभ्यासी बने। उन्होंने अनेक जैन ग्रंथों की रचना कर जैन साहित्य विशेषकर खरतर गच्छिय साहित्य को समृद्ध किया।

दादागुरुदेव की पूजा एवं आरती उनकी सर्वाधिक लोकप्रिय रचना है। यह पूजा आज सभी दादाबाड़ीओं  में गाई जाती है। वे ज्योतिष एवं आयुर्वेद के भी प्रकाण्ड विद्वान थे। उनके समय में राजस्थान में दो ही नाडी वैद्य थे उनमे से एक वे थे। उन्होंने इन विषयों पर अनेक ग्रंथों की भी रचना की है। वे न सिर्फ आयुर्वेद वल्कि होमिओपैथ, यूनानी एवं ऐलोपैथ के भी जानकार थे। वैद्य प्रदीप नाम के अपने पुस्तक में उन्होंने इन चारों प्रकार के चिकित्सा का विवरण दिया है। इसी पुस्तक की प्रस्तावना में उन्होंने अपना जीवन परिचय भी दिया है जिससे मुझे यह पता चला की उनका जन्म जियागंज, मुर्शिदाबाद में हुआ था।

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शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की भाषा भाग 6


शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की भाषा भाग 6

1. छोटू तो एकदम सुने नइ, दिन भर टोटो कोम्पनी, बकनी का भी कोई असर नइ होए। अब एक बार जम के धुलाई करना होगा.

 2. बदमाइस ठो को देखो, सुने नई, कान में जैसे रुई ठूस के रक्खिस है। इतना बीमार है लेकिन खेचल भौत करे.  कबराज जी तो सपाटू, शरीफा, नेचु, सपड़ी आम  और कमला नेबू खाने बोलीन हैं. 

3. तुम तो एक दम आलसी टट्टू हो। बेसी बक बक मत करो। 

4. बीबी धसानी खेलोगे की गुलाम चोर? गधा लोडिंग भी खेल सको।  



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