Tuesday, March 13, 2018

अजीमगंज का प्राचीन नाम डीही जैनेश्वर था


श्री विभूति भूषण दत्त की लिखी किताब पर्यटन में मुर्शिदाबाद अजीमगंज व बड़नगर में से प्राप्त जानकारी के अनुसार अजीमगंज का प्राचीन नाम डीही जैनेश्वर था। डीही का अर्थ सरोवर अथवा ग्राम समूह होता है और जैनेश्वर अर्थात जैनों के ईश्वर या तीर्थंकर परमात्मा। अनेक जिनमंदिरों से सुशोभित यह एक अति प्राचीन तीर्थस्थल था।

পর্যটনে মুর্শিদাবাদ আজিমগঞ্জ ও বড় নগর, পৃষ্ঠ ৫১ 
 संभवतः श्रमण भगवान महावीर भी यहां आ कर ठहरे थे। कालक्रम में प्राचीन मन्दिर नष्ट हो गए, यहां की जैन वसति लुप्त हो गई।  संख्या कम होने के कई कारण थे जैसे जैनों पर महाराज शशांक का अत्याचार, वैष्णव धर्म का बढ़ता प्रभाव, जैन साधु साध्वियों का आगमन कम होना आदि.

मुर्शिदाबाद की समृद्धि से आकर्षित हो कर एवं व्यापार वाणिज्य का बड़ा केंद्र जान कर मुग़ल काल मे जब राजस्थान से ओसवाल जैन लोग पुनः मुर्शिदाबाद आकर बसने लगे तब इस प्राचीन तीर्थभूमि को पुनः अपना निवास बनाया और यहां पुनः अनेक जिनमंदिरों का निर्माण करवाकर इसके तीर्थ स्वरूप को पुनर्जीवित किया।

"बंगाल के जैन मंदिर: एक शोध परियोजना" के परियोजना निदेशक डॉ शिवप्रसाद जी कुछ दिनों पूर्व अपने शोध के सिलसिले में अजीमगंज गए थे वहां उन्होंने পর্যটনে মুর্শিদাবাদ আজিমগঞ্জ ও বড় নগর पुस्तक के लेखक श्री विभूति भूषण दत्त से मुलाकात की. उन्होंने डॉ शिवप्रसाद जी को यह पुस्तक भेंट में दी. चूँकि  डॉ शिवप्रसाद जी हिंदी भाषी हैं और बांग्ला नहीं पढ़ सकते, उन्होंने मुझे ये पुस्तक कल ला कर दी और उसमे से मुझे इस तथ्य की जानकारी मिली.

Jyoti Kothari,
Advisor, Vardhaman Infotech, Jaipur. He is a Non-resident Azimganjite.) 

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Tuesday, February 6, 2018

अग्रिम आमंत्रण: प्रतीक दीक्षा

अग्रिम आमंत्रण: प्रतीक दीक्षा  

अत्यंत प्रसन्नता का विषय है की अजीमगंज, मुर्शिदाबाद निवासी स्वर्गीय श्री तीनपत सिंह जी बैद के प्रपौत्र, स्वर्गीय श्री अजीत सिंह जी सुपौत्र एवं श्रीमती पायल व स्वर्गीय श्री नरेंद्र जी बैद के सुपुत्र श्री प्रतीक जी बैद की यति दीक्षा परम पूज्य श्रीपुज्य जी श्री जिन चंद्र सूरीश्वर जी के करकमलों से विक्रमीय नववर्ष चैत्र शुक्ल १, १८ मार्च २०१८ को होने जा रहा है. द्वी दिवसीय कार्यक्रम १७ एवं १८ मार्च को जयपुर में आयोजित होगा.

स्फटिक चरण रामबाग दादाबाड़ी 
इस कार्यक्रम को मुर्शिदाबाद उत्सव जैसा रूप दिया जा रहा है जिसमे शहरवाली भोजन, साज-सज्जा, संस्कृति,  एवं ऐतिहासिक विरासत की झलक देखने को मिलेगी. श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ, जयपुर इस भव्य कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है. गलता की सुरम्य वादियों में स्थित मोहनबाड़ी की सुन्दर वातानुकूलित धर्मशाला में अतिथियों के ठहरने की व्यवस्था की गई है. इस भव्य कार्यक्रम में आप सभी की उपस्थिति सादर प्रार्थनीय है.

कृपया अपने पधारने की अग्रिम सुचना प्रदान करें जिससे लाने-ले जाने व ठहरने की व्यवस्था सुचारु रूप से हो सके. संपर्क सूत्र- उज्वल कोठारी, 9314632176 (मोबाइल).

वि. द्र.: शहरवाली समाज के पुरुषों से पारम्परिक चुने हुए धोती, कुर्ता, पगड़ी, इकलाई एवं महिलाओं से सूती बालूचरी साड़ी पहनकर आने की आग्रह भरी विनती है. 

Jyoti Kothari

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Monday, February 5, 2018

गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष

गयसाबाद (दस्तुरहाट) के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष 

अजीमगंज के पास गयसाबाद (जिला- मुर्शिदाबाद)  में एक प्राचीन मंदिर था. जब यहाँ से जैन वस्ति लुप्त हुई तब यहाँ की प्रतिमा जियागंज के कीरतबाग में ला कर विराजमान कर दी गई. लगभग ४० वर्ष पूर्व अपने बचपन में ज्योति कोठारी (मै स्वयं) ने वहां जा कर इसके ध्वंसावशेष को देखा था. उस समय एक वृद्ध मुसलमान किसान ने एक जगह दीखाकर ये बताया था की ये जैन मंदिर था. उसके बाद मैं भी वहां कभी नहीं गया. अजीमगंज-जियागंज के लोग भी संभवतः इस मंदिर को भूल गए थे. प्राचीन शिलालेखों में भी गयसाबाद का नहीं परन्तु दस्तुरहाट के मंदिर का उल्लेख है. शोध से इसकी सच्चाई का पता लगा की ये दोनों एक ही स्थान है.

प्रसिद्द जैन इतिहासज्ञ डॉक्टर शिवप्रसाद जी अभी अजीमगंज में हैं और वे आज अपने शोध कार्य के लिए गयसाबाद गए थे. उनके साथ श्री सुदीप जी श्रीमाल ने मुझे वहां के कुछ चित्र भेजे हैं. ध्वंसावशेष के इन चित्रों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है.

गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष १ 


गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष २ 

गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष ३ 
 गयसाबाद का पुराना नाम बद्रीहाट था एवं यह एक समृद्ध व्यापारिक स्थल था. सुल्तान गयासुद्दीन के नाम पर इस जगह का नाम गयसाबाद रखा गया. सर विलियम विल्सन हंटर के "ए स्टैटिस्टिकल एकाउंट ऑफ़ बंगाल" के अनुसार यहाँ पर पाली भाषा के शिलालेख मिले थे जिन्हे एसियाटिक सोसाइटी में सुरक्षित रखा गया था. इससे यह लगता है की यह स्थान बौद्ध धर्म का भी केंद्र रहा था. 


गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष ४ 

गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष ५  
गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष ६ 


गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष ७ 

गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष ८ 
नोट:  बंगाल के जैन मंदिर: एक शोध परियोजना के परियोजना निदेशक जैन इतिहास विशेषज्ञ डॉक्टर शिवप्रसाद जी इस समय अजीमगंज में हैं और तथ्यों का संग्रह कर रहे हैं, इसके बाद वो कोलकाता आएंगे। सभी से निवेदन है कि उन्हे सहयोग प्रदान करें. यदि आपके पास बंगाल के जैन के जैन मंदिर, उपाश्रय,  भोजनशाला, अतिथिशाला, धर्मशाला, जैन समाज के स्कूल, कॉलेज, अथवा इनके संस्थापक परिवारों के बारे में कोई ऐतिहासिक जानकारी या सुचना हो तो उन्हें अवश्य प्रदान करें.

Vardhaman Infotech

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Sunday, February 4, 2018

ब्रिटिश गजट में मुर्शिदाबाद का जैन समाज १८७२

ब्रिटिश गजट में मुर्शिदाबाद का जैन समाज १८७२ 


A Statistical Account of Bengal, Volume 9

By Sir William Wilson Hunter






Sir William Wilson Hunter

बंगाल का इतिहास लिखते हुए इतिहासकारों ने मुर्शिदाबाद के सम्वन्ध में बहुत कुछ लिखा है और स्वाभाविक रूप से उसमे शहरवाली जैन समाज उसके व्यक्तियों, मंदिरों एवं अन्य सामाजिक कार्यों का जिक्र आया है. इन्ही इतिहासकारों में से एक सर विलियम विल्सन हंटर ने "ए स्टैटिस्टिकल एकाउंट ऑफ़ बंगाल" (भाग १ से २०) नाम की पुस्तक लिखी जो की सन १८७५ से १८७७ के बीच प्रकाशित हुई. यह एक प्रकार से ब्रिटिश सर्कार का दस्तावेज भी है. इस किताब के भाग ९ में मुर्शिदाबाद जिले का विस्तृत वर्णन एवं सांख्यिकी विवरण है. 


यह पुस्तक अभी मेरे हाथ लगा है और मैंने इसे पढ़ना शुरू किया ही है. इस पुस्तक में २२ जगह अजीमगंज, ६ जगह जियागंज, २२ जगह जगत सेठ, ६ जगह राय धनपत सिंह, दो जगह लक्ष्मीपत सिंह, दो जगह ओसवाल, एवं १५ जगह जैन शब्द का उल्लेख मिलता है.


मुर्शिदाबाद के शहरवाली जैन समाज के इतिहास को जानने में यह पुस्तक बेहद उपयोगी है और "बंगाल के जैन मंदिर: एक शोध परियोजना" में अत्यंत सहायक है. इस पुस्तक के अध्ययन के बाद जो भी तथ्य सामने आएगा उससे सभी को यथा समय अवगत कराया जायेगा. अपने समाज के इतिहास में रूचि रखनेवालों के लिए सन्दर्भ के रूप में निम्नलिखित जानकारी दे रहा हूँ. 

इस पुस्तक के पृष्ठ संख्या २९, ४६, ५८, ८३, ८४, ८६, ९१, १४१, १४३, १४४, १४५, १४६, १४७, १४८, १५६, १५८, १६८, १६९, १७०, १७१, २१२, एवं ३७७ में "अजीमगंज"पृष्ठ संख्या २९, ४९, ८३, १४२, १६७, एवं ३८१ में जियागंजपृष्ठ संख्या ४९, ५२, ५८, १७६, १७९, १८०, १८१, १८३, १९२, २५२, २५४, २५५, २५६, २५७, २५८, २६०, २६१, २६२, २६३, २६४, २६५, एवं ३८१ जगत सेठपृष्ठ संख्या १३९, १४७, १७१, २१२, २४७, २४८ में राय धनपत सिंह, पृष्ठ संख्या ४३ एवं ८३ में ओसवाल शब्द का उल्लेख मिलता है.


नोट:  बंगाल के जैन मंदिर: एक शोध परियोजना के परियोजना निदेशक जैन इतिहास विशेषज्ञ डॉक्टर शिवप्रसाद जी इस समय अजीमगंज में हैं और तथ्यों का संग्रह कर रहे हैं, इसके बाद वो कोलकाता आएंगे। सभी से निवेदन है कि उन्हे सहयोग प्रदान करें. यदि आपके पास बंगाल के जैन के जैन मंदिर, उपाश्रय,  भोजनशाला, अतिथिशाला, धर्मशाला, जैन समाज के स्कूल, कॉलेज, अथवा इनके संस्थापक परिवारों के बारे में कोई ऐतिहासिक जानकारी या सुचना हो तो उन्हें अवश्य प्रदान करें. 

Jyoti Kothari
Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur, representing Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is a Non-resident Azimganjite.

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बालूचर एवं बालूचरी साड़ी



बालूचर एवं बालूचरी साड़ी 

बालूचरी साड़ी - गीता का उपदेश 

बालूचरी साड़ी -युद्ध का दृश्य 
बंगाल की सुप्रसिद्ध साड़ी बालूचरी, ढकइ मलमल जैसी ही इसकी भी ख्याति थी.  इसका नाम बालूचर से पड़ा. बालूचर मुर्शिदाबाद जिले के अंतर्गत एक समृद्ध शहर था. बालू अर्थात रेत, भागीरथी (गंगा) बंगाल में आते आते अपनी गति खो देती है और जगह जगह से सुख जाती है जिससे वहां पर रेत इकट्ठी हो जाती है. नदी के ऐसे भाग को स्थानीय भाषा में "चर" कहते हैं. बालू का चर होने से उस स्थान का नाम बालूचर हो गया था. ५० वर्ष पहले तक रेत का चर पड़ता था और उसे मैंने भी देखा है. फरक्का बांध बनने के बाद भागीरथी का प्रवाह बढ़ गया और "चर" समाप्त हो गया है.

बालूचरी साड़ी का इतिहास लगभग ५०० वर्ष पुराना है. बंगाल के तन्तुवाय (ताँति) अपनी दक्षता के लिए विख्यात रहे हैं. उनकी दक्षता का एक निदर्शन बालूचरी साड़ी भी है. अत्यंत दक्ष शिल्पी कड़ी मेहनत से इसे बनाते हैं. एक साड़ी बुनने में लगभग एक सप्ताह का समय लग जाता है जबकि इतने समय में १० साधारण साड़ी बनाइ जा सकती है. इसकी विशेषता इसकी पल्लू है. चौड़े पल्लू में रामायण, महाभारत, गीता आदि की कहानी दर्शाई जाती है.
बालूचरी साड़ी- नृत्यांगना 

बालूचरी साड़ी
मुर्शिदाबाद अपने रेशम के लिए भी प्रसिद्द था और यह साड़ी रेशम के धागों से बनी जाती थी. रेशम स्वयं एक महँगी वस्तु है. बालूचरी साड़ी में इसके साथ कला और परिश्रम का संगम है. स्वाभाविक है की यह बहुत महँगी होगी. पुराने समय से ही रजवाड़े, जमींदार, एवं अभिजात वर्ग की स्त्रियां इसे पहनती थी. शहरवाली समाज एक संपन्न समाज था और कला का कद्रदान भी, अतः इस समाज में बालूचरी साड़ी का लोकप्रिय होना स्वाभाविक था.
बाद में यह रेशम के साथ साथ सूती धागों से भी बनने लगा और तब इसकी कीमत भी कम हो गई. कालक्रम में मुर्शिदाबाद की यह कला यहाँ से लुप्त हो गई और अब यह विष्णुपुर में व्यापक रूप से बनने लगा है. रेशम कीड़े को मार कर बनता है इसलिए अहिंसा प्रेमी जैन परिवारों में विशुद्ध रेशम से परहेज किया जाता है. परन्तु सूती बालूचरी शहरवाली समाज में आज भी लोकप्रिय है.

नोट: संभवतः पुराने समय में अजीमगंज और जियागंज सम्मिलित रूप से बालूचर कहलाता था. बाद में नदी ने अपनी राह बदली और अजीमगंज-जियागंज के बीच से बहने लगी. कुछ पुराने मानचित्र इस ओर इंगित करते हैं. यह एक शोध का विषय है.

#Baluchari #Saree #Bengal #Murshidabad

Jyoti Kothari
(Jyoti Kothari is proprietor of Vardhaman Gems, Jaipur, representing Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is a Non-resident Azimganjite.) 

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Thursday, February 1, 2018

प्रतीक बैद की यति दीक्षा 18 मार्च को जयपुर में


श्रीपुज्य जी श्री जिन विजयेंद्र सूरी जी 
17 व 18 मार्च 2018 को जयपुर में अजीमगंज निवासी प्रतीक बैद की यति दीक्षा श्रीपुज्य जी श्री जिन चंद्र सूरी जी महाराज के कर कमलों से होने जा रही है। इस कार्यक्रम को मुर्शिदाबाद उत्सव जैसा रूप दिया जा रहा है। इस कार्यक्रम में शहरवाली समाज के अधिक से अधिक लोगों की उपस्थिति से ही समारोह गरिमापूर्ण बनेगा। अतः सभी से निवेदन है कि पारंपरिक शहरवाली पोशाक चुना हुआ धोती, कुर्ता, पगड़ी पहन कर कार्यक्रम में पधार कर अपनी संस्कृति की गरिमा बढ़ाएं।
पारम्परिक शहरवाली पोषाक 

Jyoti Kothari
(Jyoti Kothari is proprietor of Vardhaman Gems, Jaipur, representing Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is a Non-resident Azimganjite.) www.vardhamangems.com

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Tuesday, January 2, 2018

शहरवाली समाज का वैभव एवं श्री पूज्यों की परंपरा


शहरवाली समाज का वैभव एवं श्री पूज्यों की परंपरा

मुर्शिदाबाद अपनी स्थापना के समय से ही भारत के समृद्धतम स्थलों में से रहा है. मुग़ल काल के उत्तरार्ध में वसा यह शहर अपने वैभव, रईसी, कला और नज़ाकत के लिए प्रसिद्द था. अंग्रेज वाइसराय वारेन हेस्टिंग्स ने लिखा है की मुर्शिदाबाद का प्रति व्यक्ति आय उस समय के लन्दन से ६ गुना था. जगत सेठ, अमीचंद से प्रारम्भ कर गोलेच्छा, दुगड़, दुधोडिया, नाहर, नवलखा, कोठारी, सिंघी, श्रीमाल आदि जैन परिवार अपनी समृद्धि और रईसी के लिए भारत भर में जाने जाते थे. दिल्ली के मुग़ल बादशाह और ईस्ट इण्डिया कंपनी भी जगत सेठ से क़र्ज़ लिया करते थे. उस समय वहां के जैन परिवारों का नवाबों और अंग्रेजों दोनों से ही घनिष्ठ संपर्क था. शासक परिवारों से संपर्क के कारण उनका दबदबा भी पुरे भारत में था.

अजीमगंज में रत्नों की प्रतिमा 


अजीमगंज में कसौटी के खम्बे की सुन्दर कलाकृति 
वहां के जैनों में रईसी थी पर अय्यासी नहीं. इतनी समृद्धि और शक्ति के बाबजूद वहां के लोगों की धार्मिक आस्था अटूट थी. अजीमगंज जियागंज के १४ विशाल जिनमंदिर उसी आस्था के प्रतीक के रूप में आज भी विद्यमान हैं. काठगोला, रामबाग, कीरतबाग जैसे विशाल मंदिर व दादाबाड़ियाँ, महिमापुर में जगत सेठ द्वारा निर्मित श्री पार्श्वनाथ भगवान् का कसौटी का मंदिर, हरकचन्द गोलेच्छा परिवार द्वारा निर्मित छोटी शांतिनाथ जी के मंदिर की रत्नमय चौवीसी, दुगड़ परिवार द्वारा निर्मित श्री सम्भवनाथ स्वामी मंदिर के विशाल मूलनायक, कोठारी परिवार के श्री नेमिनाथ स्वामी के मंदिर की तीन सम्प्रतिकालीन प्रतिमा आदि सभी उस समय की धार्मिकता के जीवंत प्रमाण हैं.

इतना ही नहीं अजीमगंज-जियागंज के शहरवालियों ने पालीताना, सम्मेतशिखर, पावापुरी, क्षत्रियकुंड, चम्पापुरी, गुनायाजी आदि अनेक तीर्थों में भव्य जिनमंदिरों का निर्माण कराया है. जिन मंदिरों के साथ उपाश्रय (पौषाल), आयम्बिलशाला, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, धर्मशाला, म्युनिसिपल भवन, लाइब्रेरी  आदि अनेकों लोक कल्याणकरी परियोजनाओं का निर्माण एवं संचालन शहरवाली समाज के व्यक्तियों द्वारा कराया गया. इन सभी कामों में श्री पूज्यों और यतियों की प्रेरणा थी.

उस समय बंगाल जैसे दूरस्थ प्रान्त में साधु समाज का विचरण नगण्य था पर श्री पूज्यों एवं यतियों की परंपरा अत्यंत सुदृढ़ थी. श्री पूज्यों के प्रति वहां जबरदस्त श्रद्धा थी और उन्हें ही जैनाचार्य के रूप में माना जाता था.  उसमे भी खरतर गच्छ की बीकानेर गद्दी के श्री पुज्यों का प्रभाव शहरवाली समाज में सर्वाधिक था. कोई भी धार्मिक कार्य उनकी आज्ञा के बिना नहीं होता था.

श्रीपुज्य जी श्री जिन विजयेंद्र सूरी 
बीकानेर गद्दी के श्री पूज्य श्री जिन सौभाग्य सूरी सबसे पहले अजीमगंज पधारे थे. तबसे ऐसी परंपरा चली की बीकानेर में गद्दीनसीन होने के बाद का चातुर्मास अजीमगंज में ही होता था. अजीमगंज चातुर्मास करने के बाद ही कोई भी श्री पूज्य अन्यत्र चौमासा कर सकते थे.

खरतर गच्छ के अलावा लौंका गच्छ, विजय गच्छ, तपागच्छ के यतिलोग भी अजीमगंज-जीयागंज में सतत रहा करते थे. यहाँ पर इन यतियों ने अनेकों ग्रंथों की रचना कर ज्ञान जगत को समृद्ध किया है जिसकी सूचि भी बहुत लम्बी है. आज यति परंपरा लुप्तप्राय है, ऐसी स्थिति में बीकानेर गद्दी के वर्त्तमान श्री पूज्य जी श्री जिन चंद्र सूरी जी के कर कमलों से अजीमगंज के ही श्री प्रतीक बैद की यति दीक्षा होने जा रही है. यति समाज के पूर्व गौरव को पुनर्जागृत करने के लिए फिर से शहरवाली समाज का ही एक युवा आगे आया है.

#मुर्शिदाबाद #अजीमगंज #जियागंज #श्रीपूज्य #शहरवाली #जैन

Jyoti Kothari (Vardhaman Gems, Jaipur, representing Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is a Non-resident Azimganjite.)






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Sunday, December 10, 2017

लालू भाई (प्रदीप कोठारी) नहीं रहे

लालू भाई (प्रदीप कोठारी) नहीं रहे 

मेरे बड़े भाई और सभी के प्रिय लालू भाई का आज सुबह कोलकाता में देहावसान हो गया. यह मेरे लिए बहुत ही दुःख की घडी है, दुःख और भी बढ़ जाता है क्योंकि उनके अंतिम समय में मैं उनके पास नहीं था. आज सुबह जब भतीजे चेतन ने फ़ोन पर समाचार दिया तो एक बार तो विश्वास ही नहीं हुआ. लालू भाई पिछले २ महीने से काफी बीमार चल रहे थे और ७१ वर्ष की आयु में आज उन्होंने अपना अंतिम सांस लिया. आप  अपनी धर्मपत्नी श्रीमती कंचन एवं एक पुत्री श्रीमती श्री बांठिया को अपने पीछे बिलखता हुआ छोड़ गए. 

लालू भाई के नाम से जान जान में विख्यात श्री प्रदीप कोठारी का जन्म अजीमगंज में हुआ. वे स्वर्गीय श्री समरेन्द्रपत जी कोठारी (बेटा बाबू) के पुत्र एवंम स्वर्गीय श्री चन्द्रपत जी कोठारी के पौत्र थे. आपकी माता जी श्रीमती पुतुल कुमारी अभी जीवित हैं और उन्हें पुत्र वियोग का दुःख सहन करना पड़ रहा है.

लालू भाई अपने पैतृक व्यवसाय जवाहरात का काम करते थे और साथ में धार्मिक- सामाजिक कार्यों में सदा अग्रणी रहते थे. श्री महावीर स्वामी मंदिर कोलकाता के ट्रस्टी के रूप में आपने अविस्मरणीय सेवाएं प्रदान की है. वे जैन जोहरी संस्थान के भी संस्थापक सदस्यों में से थे एवं श्रीमद राजचन्द्र आश्रम, हम्पी में भी ट्रस्टी के रूप में अपनी सेवाएं प्रदान की. आप नियमित प्रभु पूजा करंट थे एवं स्वाध्याय व ध्यान के प्रति भी उनका लगाव था. उन्होने कई बार विपश्यना ध्यान का शिविर भी किया था. बच्चों को धर्म के प्रति प्रेरित करने के लिए उन्होंने बहुत काम किया. 

यद्यपि वे मेरे ताऊजी के लड़के थे लेकिन मेरे प्रति उनका स्नेह सगे भाई से भी बढ़ कर था. मैं जयपुर और वो कोलकाता रहते थे पर नियमित रूप से उनसे फ़ोन पर बातचीत होती रहती थी. जब हम मिलते थे तो धर्मचर्चा में घंटों का समय कब व्यतीत हो जाता था पता ही नहीं चलता था. आज वो हमारे बीच नहीं हैं और यह खालीपन कैसे भरेगा पता नहीं. 

मैं अरिहंत परमात्मा से उनके सद्गति की कामना करता हूँ. वो जहाँ भी हों सुख एवं शांति से रहें यही प्रार्थना है. 

Jyoti Kothari 
(Jyoti Kothari is proprietor of Vardhaman Gems, Jaipur, representing Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is a Non-resident Azimganjite.) 

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Saturday, January 14, 2017

History of Shaharwali Jain community of Murshidabad


History of Shaharwali Jain community of Murshidabad: A request
Jyoti Kothari

It is a well-known fact tat Shaharwali community of Azimganj-Jiaganj-Murshidabad has a very rich tradition of vibrant culture. In fact, this community has enriched the culture of Bengal in one hand and of the Jain society on the other. However, it is regrettable that no systemic research work has done to document the history of Shaharwali society.





It is a well-known fact that Shaharwali community of Azimganj-Jiaganj-Murshidabad has a very rich tradition of vibrant culture. In fact, this community has enriched the culture of Bengal in one hand and of the Jain society on the other. However, it is regrettable that no systemic research work has done to document the history of Shaharwali society.

Murshidabad Heritage Society has taken an initiative to popularize the rich culture through various events. Few books are also published. However, we need a systemic research and that cannot be completed without referring to the Jain temples of Murshidabad, contributions of Sripujjya Ji, Yatis, and Sadhu-Sadhvis.

The culture of Shaharwali society was so embedded with the Jain religion that cannot be separated. The Jain community of Rajasthan (Rajputana, Marwad) was migrated from Rajasthan to find their fortune in Bengal, especially Murshidabad. They have contributed to the economic and social development of Murshidabad in Bengal.

Though the Shaharwali community was working continually with the Muslim Nawabs and the local Bengali society, they never forget their religion and carefully protected the same. The huge Jain temples, Poshals, Amil khata are the symbols of the dedication to the Jain religion.

I am trying to collect and preserve history and culture of the Shaharwali society for many years through writing blogs and propagating those I social media. I, take the opportunity to request, the office-bearers and executive of Murshidabad heritage society along with the Sri Sangh and Murshidabad Sangh to make it a point to conduct systemic research.

I believe, they will take my request seriously.

Jyoti Kothari
(Jyoti Kothari is proprietor of Vardhaman Gems, Jaipur, representing Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is a Non-resident Azimganjite.) www.vardhamangems.com

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Sunday, January 1, 2017

अजीमगंज नेमिनाथ स्वामी का प्राचीन स्तवन


अजीमगंज स्थित श्री नेमिनाथ स्वामी का एक अति प्राचीन स्तवन अभी अभी देखने मिला है. दो सौ वर्षों से भी अधिक प्राचीन यह स्तवन उपाध्याय श्री क्षमाकल्याण जी द्वारा रचित है. इस स्तवन के रचना की तिथि अज्ञात है. क्षमाकल्याण जी महान साधक एवं वरिष्ठ विद्वान् थे जिनके स्वर्गवास का दो सौ वर्ष मनाया जा रहा है. खरतर गच्छ परम्परा में उन्होंने क्रियोद्धार कर सुवुहित मार्ग को दृढ किया था. आज भी दीक्षा के समय क्षमाकल्याण जी का वासक्षेप प्रदान किया जाता है.


Kshamakalyan Khartar Gachchh Upadhyay in Bikaner Kripachandra Suri upashray
उपाध्याय क्षमाकल्यन जी, बीकानेर 
उन्होंने अजीमगंज के नेमिनाथ भगवन का स्तवन लिखा है जिसका अर्थ ये है की यह स्तवन दो सौ वर्षों से अधिक पुराना है, इससे यह नया तथ्य भी प्रकाशित होता है की नेमिनाथ स्वामी का मंदिर दो सौ सालों से भी अधिक पुराना है. अभी तक यह माना जाता रहा है की यह मंदिर लगभग सवा सौ साल पहले बना था.

अजीमगंज नेमिनाथ मंदिर मूलगंभारा 
उपाध्याय श्री क्षमाकल्याण जी के स्वर्गवास के द्विशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में खरतर गच्छाधिपति आचार्य श्री मणिप्रभ सूरीश्वर जी के शिष्य श्री मेहुलप्रभ सागर जी ने "क्षमाकल्याण जी कृति संग्रह" नाम से एक पुस्तक संकलित की है जिसके भाग १, पृष्ठ ९७ में यह स्तवन प्रकाशित हुआ है.  खरतर गच्छ साहित्यकोषः क्रमांक ३५४७ से इसे संकलित किया गया है.

नेमिनाथ स्वामी सुसज्जित रंगमंडप 
अजीमगंज मंडन 
श्री नेमिनाथ जिनेन्द्र स्तवन
(ढाल-नीबडलीनी)

जगपति नेमि जिनंद प्रभु म्हारा, जग. 
वाविसम शासन धनी, गिरुवा गुणनिधि राज। 
समुद्रविजय शिवा नन्द प्रभु म्हारा, जग 
सांवल वरन सुहामणा, गिरुवा गुणनिधि राज. 
यादवकुल शणगार प्रभु म्हारा,
शंख लांछन प्रभु शोभता,  गिरुवा गुणनिधि राज।
सौरिपुर अवतार प्रभु म्हारा, 
अपराजित सुरलोक थी, गिरुवा गुणनिधि राज।
देह धनुष दस मान प्रभु म्हारा,  
रूप अनूप विराजता, गिरुवा गुणनिधि राज।
आऊ थिति परमान  प्रभु म्हारा,  
वरस सहस इक अति भलो, गिरुवा गुणनिधि राज।
प्रभु म्हारा,  गिरुवा गुणनिधि राज।
नवयौवन वर नार प्रभु म्हारा,
उग्रसेन नृप नन्दनी  गिरुवा गुणनिधि राज।
नाव भव नेह निवार प्रभु म्हारा,
राजुल राणी परिहरि, गिरुवा गुणनिधि राज।
पशुआँ तणी पुकार प्रभु म्हारा,
सांभली करुणा रास भर्या, गिरुवा गुणनिधि राज।
रथ फेरी तिण वार प्रभु म्हारा,
फिर आया निज मंदिरे,
गिरणारे संयम ग्रह्यो, गिरुवा गुणनिधि राज।
देइ संवत्सरी दान प्रभु म्हारा,  गिरुवा गुणनिधि राज।
पामी केवलज्ञान प्रभु म्हारा,
संघ चतुर्विध थपियो, गिरुवा गुणनिधि राज।
पंच सयां छत्तीस प्रभु म्हारा,
मुनिवर साथे मुनिपति, गिरुवा गुणनिधि राज।
शिव पुहूता सुजगीश प्रभु म्हारा,
पद्मासन बैठा प्रभु, गिरुवा गुणनिधि राज।
मासखमण तप मान प्रभु म्हारा,
करि अणशण आराधना, गिरुवा गुणनिधि राज।
गढ़ गिरनार प्रधान प्रभु म्हारा,
तीन कल्याणक जिहां थया, गिरुवा गुणनिधि राज।
योगीश्वर शिरताज प्रभु म्हारा,
निरुपाधिक गुण आगरु, गिरुवा गुणनिधि राज।
अविचल आतमराज प्रभु म्हारा,
पाम्यो परमानन्द मैं, गिरुवा गुणनिधि राज।
सकरण वीरज अंत प्रभु म्हारा,
निरुपाधिक गुण आगरु,गिरुवा गुणनिधि राज।
नगर अजीमगंज भाण प्रभु म्हारा,
नेमि जिनेश्वर साहिबा,गिरुवा गुणनिधि राज।
शुद्ध क्षमाकल्याण प्रभु म्हारा,
आतम गुण मुझ दीजिये  गिरुवा गुणनिधि राज।

श्री नेमिनाथ भगवान् का मंदिर १२५ वर्ष प्राचीन माना जाता है, परंतु कुछ ऐतिहासिक तथ्यों से संकेत मिलता है की यह मंदिर उससे कहीं अधिक पुराना है. प्राचीन मंदिर के गंगा के कटान में जाने के बाद यह नया मंदिर बनाया गया था ऐसा मुझे अजीमगंज के श्री विमल नवलखा ने बताया था. क्षमा कल्याण जी द्वारा रचित यह स्तवन मिलने से उनके कथन की पुष्टि होती है और श्री नेमिनाथ जी के मंदिर का दो सौ वर्ष से अधिक प्राचीन होना सिद्ध होता है. परंतु यह मंदिर वास्तव में और कितना पुराना है यह अभी भी शोध का विषय है.

अभी ये पता करना है की श्री नेमिनाथ स्वामी के नए मंदिर में जो मूलनायक विराजमान हैं वो प्राचीन मंदिर के ही हैं या और कहीं से लाइ गई है? उस प्राचीन मंदिर को किसने और कब बनाया था? पुराना मंदिर कब गंगा के कटान में चला गया? इस प्रकार अनेक तथ्य सामने लाने के लिए शोध की आवश्यकता है; इस सम्वन्ध में किसी भी प्रकार की जानकारी हो तो अवश्य संपर्क करने का कष्ट करें.

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Jyoti Kothari
(Jyoti Kothari is proprietor of Vardhaman Gems, Jaipur, representing Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is a Non-resident Azimganjite.)
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