Saturday, March 23, 2019

अजीमगंज मंडन 
श्री नेमिनाथ जिनेन्द्र स्तवन
(ढाल-नीबडलीनी)

जगपति नेमि जिनंद प्रभु म्हारा, जग. 
वावीसम शासन धनी, गिरुवा गुणनिधि राज। 
समुद्रविजय शिवा नन्द प्रभु म्हारा, जग 
सांवल वरन सुहामणा, गिरुवा गुणनिधि राज. 
यादवकुल शणगार प्रभु म्हारा,
शंख लांछन प्रभु शोभता,  गिरुवा गुणनिधि राज।
सौरिपुर अवतार प्रभु म्हारा, 
अपराजित सुरलोक थी, गिरुवा गुणनिधि राज।
देह धनुष दस मान प्रभु म्हारा,  
रूप अनूप विराजता, गिरुवा गुणनिधि राज।
आऊ थिति परमान  प्रभु म्हारा,  
वरस सहस इक अति भलो, गिरुवा गुणनिधि राज। 
प्रभु म्हारा,  गिरुवा गुणनिधि राज।
नवयौवन वर नार प्रभु म्हारा,
उग्रसेन नृप नन्दनी  गिरुवा गुणनिधि राज।
नाव भव नेह निवार प्रभु म्हारा,
राजुल राणी परिहरि, गिरुवा गुणनिधि राज।
पशुआँ तणी पुकार प्रभु म्हारा,
सांभली करुणा रास भर्या, गिरुवा गुणनिधि राज।
रथ फेरी तिण वार प्रभु म्हारा,
फिर आया निज मंदिरे,
गिरणारे संयम ग्रह्यो, गिरुवा गुणनिधि राज।
देइ संवत्सरी दान प्रभु म्हारा,  गिरुवा गुणनिधि राज।
पामी केवलज्ञान प्रभु म्हारा,
संघ चतुर्विध थपियो, गिरुवा गुणनिधि राज।
पंच सयां छत्तीस प्रभु म्हारा,
मुनिवर साथे मुनिपति, गिरुवा गुणनिधि राज।
शिव पुहूता सुजगीश प्रभु म्हारा,
पद्मासन बैठा प्रभु, गिरुवा गुणनिधि राज।
मासखमण तप मान प्रभु म्हारा,
करि अणशण आराधना, गिरुवा गुणनिधि राज।
गढ़ गिरनार प्रधान प्रभु म्हारा,
तीन कल्याणक जिहां थया, गिरुवा गुणनिधि राज।
योगीश्वर शिरताज प्रभु म्हारा,
निरुपाधिक गुण आगरु, गिरुवा गुणनिधि राज।
अविचल आतमराज प्रभु म्हारा,
पाम्यो परमानन्द मैं, गिरुवा गुणनिधि राज।
सकरण वीरज अंत प्रभु म्हारा, 
निरुपाधिक गुण आगरु,गिरुवा गुणनिधि राज।
नगर अजीमगंज भाण प्रभु म्हारा,
नेमि जिनेश्वर साहिबा,गिरुवा गुणनिधि राज।
शुद्ध क्षमाकल्याण प्रभु म्हारा,
आतम गुण मुझ दीजिये  गिरुवा गुणनिधि राज।


उपाध्याय श्री क्षमा कल्याण जी ने दो सौ वर्ष से भी ज्यादा पहले यह भजन लिखा था. 


Jyoti Kothari,  the proprietor of Vardhaman Gems, Jaipur, representing Centuries-Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is a Non-resident Azimganjite. 

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Sunday, February 24, 2019

कैसे बनी शहरवाली बोली? मुर्शिदाबाद जैन समाज की भाषा


कैसे बनी शहरवाली बोली? मुर्शिदाबाद जैन समाज की भाषा 

हम भौत दिन से इ ब्लॉग लिक्खें हैं किन्तु हरदम हिंदी नइ तो इंग्रेजी में इ लिक्खें. लेकिन मन में किया की इ  ब्लॉगपोस्ट ठो  शहरवाली बोली में इ लिक्खङ्ग। सबको शायत मालूम नइ है की शहरवाली बोली कैसे बना. अब तो बेसी भाग आदमी शहरवाली बोलना इ  छोड़ दिस है. हो सके नया लडक़ावाला लोग को तो इसका पता इ नइ हो.

जब दो अढ़ाई सौ वरस पहले हमलोग राजस्थान- मारवाड़ से हियाँ मुर्शिदाबाद  आयें थैं तब हमलोग का बोली मारवाड़ी इ था. मारवाड़ी हिंदी के तरे इ है और धरम का बई भी सब हिंदी में था. हियाँ बीकानेर से गुरु जी और सिरिपुज्जी लोग का भौत आना जाना था, उलोग पाठशाला में भी धरम और हिंदी पढ़ाते थे इससे शहरवाली बोली हिंदी से मिलता जुलता इ था. धरम का पढ़ने से संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश भाषा का शब्द भी इसमें मिला. फेर हियाँ आने के बाद नवाब और मुसलमान लोग के संग रहेने से उलोग का बोली उर्दू उसमे मिल गिया। हियाँ का आदमी लोग बंगाली था और बँगला बोलता था तो आस्ते आस्ते उसमे बंगला भी मिल गिया। अजीमगंज, जियागंज, बालूचर में रहने वाले लोग मज़े का पढ़े लिखे थे और अच्छा इंग्रेजी भी जानते थे. साहब लोग के संग भी हियाँ के बड़े आदमी लोग का अच्छा उठ बैठ था. सो हियाँ की बोली में इंग्रेजी भी मिक्स हो गिया. थोड़ा भौत फ़ारसी, तुर्की, आर्मेनियन, फ्रेंच भाषा का शब्द भी उसमे मिला. ऐसे कर के इत्ता जगे का शब्द, भाषा और बोली मिलके शहरवाली बोली बन गिया। किन्तु इसका कोई बैकारोन नइ  है, इसलिए इसको भाषा के गिनती में  नइ लिया जा सके.

४०-५० बरस पहले जब हमलोग अजीमगंज में रहते थें तब सबकोई अइ बोली में इ बोलता था. मेरा नानाबाड़ी कलकत्ते में झौरी साथ में है, हुवाँ तो सबकोई हिंदी इ बोलता था. छोटे में जब हमलोग नानाबाडी जातें तब हमलोग के बोली का सबकोई भौत मज़ाक उड़ाता था लेकिन हमलोग ठीक से हिन्दी नइ बोल सकते थें, तो सुनना पड़ता था और अच्छा नइ लगता था. अब बेसी भाग आदमी अजीमगंज जियागंज से भार रहने लग गिया है बोलके उलोग भी अब आस्ते आस्ते अपना बोली भूलने लग गिया। नया लड़काबाला लोग बेसी करके इंग्रेजी स्कूल में पढ़े और थोड़ा हिंदी और बांग्ला भी सीखे। घर में भी अब शहरवाली बोली का चलन काम हो गया है बोलके उलोग तो अपना भाषा मोटामोटी जाने इ नई.

हम भी ३५ बरस पैले जैपुर आ गियें थैं सो हियाँ की बोली इ बोलने लगैं किन्तु अजीमगंज के बोली से अभी भी प्रेम है बोलके आज इठो लिखने का मन हो गिया। भौत  दिन बाद लिखैं बोलके कुछ भूल होये तो ठीक कर लीजेगा. और हाँ, एक ठो बात और, आप लोग भी इसमें थोड़ा लिखिए तो अपना भाषा थोड़ा लोग को मालूम पड़ेगा. नया बच्चा लोग को भी थोड़ा इसब पढईये, और बोलना सिखइये तब तो अपना भाषा ज़िंदा रैगा।

शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की भाषा भाग ७


Jyoti Kothari
(Jyoti Kothari is the proprietor of Vardhaman Gems, Jaipur, representing a centuries-old tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is a Non-resident Azimganjite.) 

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शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की भाषा भाग ७

शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की भाषा भाग ७ 

१. बेशी ओदा खोदा करने से कुछ नहीं होगा। जो हमलोग को मालूम है उससे बेसी उल्लोग को बी मालूम नई है.
२. उत्ता टुकु खाइस है.
३. कुएं से बैङ्गि में पानी पडिंदे में भर दो.
४. गोरु को घांस और पाखी को चाबल दे दीजो.
५. बड़ा भाई, मझला भाई, सझला भाई, छोटा भाई, नन्हा भाई, फुच्ची भाई और नन्हा फुच्ची भाई सब कोई सझली भुआमा और नन्ही फुच्ची मासिमा के संग जात्रा करने पालीताना गिया है.
६. बीकानेर में सिरि पुजजी म्हाराज का पुषाल है. हुवाँ उनके संग भौत सारे गुरूजी लोग भी रहें.
७. उसके मन में भौत छक्का पंजा है और सात पांच भी बेसी करे बोलके उससे कोई भिड़ने नइ मांगे.
८. कोई भी मसाले के गुंड़े को बुकनी बोले. तरकारी सिझाने के पहले उसमे मसाले का बुकनी डालना चहिए?
९. भौत गरम है. इत्ता सट सट के मत बैठो.
१०. बाबू को बुखार है, आज न्हलइयो मत, खाली मु-हाथ धुला दीजो.
११. आज बदली करके रक्खीस है,  गुमस है, लेकिन बरसात नइ होये.
१२. आंग हात में दरद होये तो कबराज जी को दिखाओ नइ क्यों?
१३. गोटे बदन में कादा माख के आया है.
१४. चाँई मुलाइन लोग से तरकारी खरीद लियो?
१५.  छत में एक ठो तीर और दो ठो बरगा बदलाना है.  दागरेज़ी कराने के लिए मिस्त्री को तो बोल दियो किन्तु पायेट का बोलियो नइ. दूसरे छत के लिए सुरकी कम पडेगा थोड़ा राबिस भी ले लीजो. दीवाल का प्लास्टर आज नइ होगा क्योंकि मिस्त्री करनी तो ले आया रूसा लाना भूल गिया। पलस्तर हो जाये तो हात के हात पुचारा भी करवा लीजो.
१६. आज बड़ी कोठी के पुश्ते में सर्भाव जीमण होगा.
१७. थोड़ा सा पैसा क्या हो गिया, अदराने लग गिया, बेसी बोली फूटने लग गिया। सोजा सोजी बोले तो इत्ता घमंड हो गिया की......
१८. कडबेल के पाचक से फुट्टापुड़ी खा लो.



शहरवाली शब्दकोश (शब्दावली) Murshidabad Dictionary

शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की भाषा भाग 6

शहरवाली बोली के कुछ और उदहारण: मुर्शिदाबाद की भाषा भाग ४

शहरवाली शब्दों का वाक्यों में प्रयोग: मुर्शिदाबाद की बोली भाग ३

शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की बोली भाग २

शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की बोली भाग १

Jyoti Kothari
(Jyoti Kothari is the proprietor of Vardhaman Gems, Jaipur, representing Centuries-Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is a Non-resident Azimganjite.)


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Thursday, January 10, 2019

शहरवाली समाज मे प्रचलित फल

एक समय था जब अजीमगंज में वहां के स्थानीय फल ही मिलते थे पर वो सस्ते होते थे। आजके प्रचलित फल अनार, सेव आदि थोड़ी बहुत मात्रा में कोलकाता से आते थे और महंगे होते थे।

मैं उन फलों के नाम आज याद कर रहा था, अगर आप कुछ जोड़ सकें तो इस सूची को समृद्ध करें।
केला, पपीता, नारंगी (संतरा नही), सपाटु (सफेदा, चीकू), शरीफा (सीताफल), बेर, पेमली बेर, फालसा, जामुन, सफेद जामुन, नेचु (लीची), कटहल, सपड़ी आम (अमरूद), खरबूजा, तरबूज, डाव (नारियल), खजूर, तलखुन (ताड़), बड़ा नेबु (बिजोरा), और सबसे ज्यादा *फलों का राजा आम।*

इसके अलावा अमड़ा, कमरख, करौंदा, आंवला और जलपाई को भी फलों की श्रेणी में रखा जा सकता है।

ज्योति कोठारी


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Saturday, August 4, 2018

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Tuesday, March 13, 2018

अजीमगंज का प्राचीन नाम डीही जैनेश्वर था


श्री विभूति भूषण दत्त की लिखी किताब पर्यटन में मुर्शिदाबाद अजीमगंज व बड़नगर में से प्राप्त जानकारी के अनुसार अजीमगंज का प्राचीन नाम डीही जैनेश्वर था। डीही का अर्थ सरोवर अथवा ग्राम समूह होता है और जैनेश्वर अर्थात जैनों के ईश्वर या तीर्थंकर परमात्मा। अनेक जिनमंदिरों से सुशोभित यह एक अति प्राचीन तीर्थस्थल था।

পর্যটনে মুর্শিদাবাদ আজিমগঞ্জ ও বড় নগর, পৃষ্ঠ ৫১ 
 संभवतः श्रमण भगवान महावीर भी यहां आ कर ठहरे थे। कालक्रम में प्राचीन मन्दिर नष्ट हो गए, यहां की जैन वसति लुप्त हो गई।  संख्या कम होने के कई कारण थे जैसे जैनों पर महाराज शशांक का अत्याचार, वैष्णव धर्म का बढ़ता प्रभाव, जैन साधु साध्वियों का आगमन कम होना आदि.

मुर्शिदाबाद की समृद्धि से आकर्षित हो कर एवं व्यापार वाणिज्य का बड़ा केंद्र जान कर मुग़ल काल मे जब राजस्थान से ओसवाल जैन लोग पुनः मुर्शिदाबाद आकर बसने लगे तब इस प्राचीन तीर्थभूमि को पुनः अपना निवास बनाया और यहां पुनः अनेक जिनमंदिरों का निर्माण करवाकर इसके तीर्थ स्वरूप को पुनर्जीवित किया।

"बंगाल के जैन मंदिर: एक शोध परियोजना" के परियोजना निदेशक डॉ शिवप्रसाद जी कुछ दिनों पूर्व अपने शोध के सिलसिले में अजीमगंज गए थे वहां उन्होंने পর্যটনে মুর্শিদাবাদ আজিমগঞ্জ ও বড় নগর पुस्तक के लेखक श्री विभूति भूषण दत्त से मुलाकात की. उन्होंने डॉ शिवप्रसाद जी को यह पुस्तक भेंट में दी. चूँकि  डॉ शिवप्रसाद जी हिंदी भाषी हैं और बांग्ला नहीं पढ़ सकते, उन्होंने मुझे ये पुस्तक कल ला कर दी और उसमे से मुझे इस तथ्य की जानकारी मिली.

Jyoti Kothari,
Advisor, Vardhaman Infotech, Jaipur. He is a Non-resident Azimganjite.) 

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Tuesday, February 6, 2018

अग्रिम आमंत्रण: प्रतीक दीक्षा

अग्रिम आमंत्रण: प्रतीक दीक्षा  

अत्यंत प्रसन्नता का विषय है की अजीमगंज, मुर्शिदाबाद निवासी स्वर्गीय श्री तीनपत सिंह जी बैद के प्रपौत्र, स्वर्गीय श्री अजीत सिंह जी सुपौत्र एवं श्रीमती पायल व स्वर्गीय श्री नरेंद्र जी बैद के सुपुत्र श्री प्रतीक जी बैद की यति दीक्षा परम पूज्य श्रीपुज्य जी श्री जिन चंद्र सूरीश्वर जी के करकमलों से विक्रमीय नववर्ष चैत्र शुक्ल १, १८ मार्च २०१८ को होने जा रहा है. द्वी दिवसीय कार्यक्रम १७ एवं १८ मार्च को जयपुर में आयोजित होगा.

स्फटिक चरण रामबाग दादाबाड़ी 
इस कार्यक्रम को मुर्शिदाबाद उत्सव जैसा रूप दिया जा रहा है जिसमे शहरवाली भोजन, साज-सज्जा, संस्कृति,  एवं ऐतिहासिक विरासत की झलक देखने को मिलेगी. श्री जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ संघ, जयपुर इस भव्य कार्यक्रम का आयोजन कर रहा है. गलता की सुरम्य वादियों में स्थित मोहनबाड़ी की सुन्दर वातानुकूलित धर्मशाला में अतिथियों के ठहरने की व्यवस्था की गई है. इस भव्य कार्यक्रम में आप सभी की उपस्थिति सादर प्रार्थनीय है.

कृपया अपने पधारने की अग्रिम सुचना प्रदान करें जिससे लाने-ले जाने व ठहरने की व्यवस्था सुचारु रूप से हो सके. संपर्क सूत्र- उज्वल कोठारी, 9314632176 (मोबाइल).

वि. द्र.: शहरवाली समाज के पुरुषों से पारम्परिक चुने हुए धोती, कुर्ता, पगड़ी, इकलाई एवं महिलाओं से सूती बालूचरी साड़ी पहनकर आने की आग्रह भरी विनती है. 

Jyoti Kothari

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Monday, February 5, 2018

गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष

गयसाबाद (दस्तुरहाट) के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष 

अजीमगंज के पास गयसाबाद (जिला- मुर्शिदाबाद)  में एक प्राचीन मंदिर था. जब यहाँ से जैन वस्ति लुप्त हुई तब यहाँ की प्रतिमा जियागंज के कीरतबाग में ला कर विराजमान कर दी गई. लगभग ४० वर्ष पूर्व अपने बचपन में ज्योति कोठारी (मै स्वयं) ने वहां जा कर इसके ध्वंसावशेष को देखा था. उस समय एक वृद्ध मुसलमान किसान ने एक जगह दीखाकर ये बताया था की ये जैन मंदिर था. उसके बाद मैं भी वहां कभी नहीं गया. अजीमगंज-जियागंज के लोग भी संभवतः इस मंदिर को भूल गए थे. प्राचीन शिलालेखों में भी गयसाबाद का नहीं परन्तु दस्तुरहाट के मंदिर का उल्लेख है. शोध से इसकी सच्चाई का पता लगा की ये दोनों एक ही स्थान है.

प्रसिद्द जैन इतिहासज्ञ डॉक्टर शिवप्रसाद जी अभी अजीमगंज में हैं और वे आज अपने शोध कार्य के लिए गयसाबाद गए थे. उनके साथ श्री सुदीप जी श्रीमाल ने मुझे वहां के कुछ चित्र भेजे हैं. ध्वंसावशेष के इन चित्रों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है.

गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष १ 


गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष २ 

गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष ३ 
 गयसाबाद का पुराना नाम बद्रीहाट था एवं यह एक समृद्ध व्यापारिक स्थल था. सुल्तान गयासुद्दीन के नाम पर इस जगह का नाम गयसाबाद रखा गया. सर विलियम विल्सन हंटर के "ए स्टैटिस्टिकल एकाउंट ऑफ़ बंगाल" के अनुसार यहाँ पर पाली भाषा के शिलालेख मिले थे जिन्हे एसियाटिक सोसाइटी में सुरक्षित रखा गया था. इससे यह लगता है की यह स्थान बौद्ध धर्म का भी केंद्र रहा था. 


गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष ४ 

गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष ५  
गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष ६ 


गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष ७ 

गयसाबाद के प्राचीन जैन मंदिर का ध्वंसावशेष ८ 
नोट:  बंगाल के जैन मंदिर: एक शोध परियोजना के परियोजना निदेशक जैन इतिहास विशेषज्ञ डॉक्टर शिवप्रसाद जी इस समय अजीमगंज में हैं और तथ्यों का संग्रह कर रहे हैं, इसके बाद वो कोलकाता आएंगे। सभी से निवेदन है कि उन्हे सहयोग प्रदान करें. यदि आपके पास बंगाल के जैन के जैन मंदिर, उपाश्रय,  भोजनशाला, अतिथिशाला, धर्मशाला, जैन समाज के स्कूल, कॉलेज, अथवा इनके संस्थापक परिवारों के बारे में कोई ऐतिहासिक जानकारी या सुचना हो तो उन्हें अवश्य प्रदान करें.

Vardhaman Infotech

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Sunday, February 4, 2018

ब्रिटिश गजट में मुर्शिदाबाद का जैन समाज १८७२

ब्रिटिश गजट में मुर्शिदाबाद का जैन समाज १८७२ 


A Statistical Account of Bengal, Volume 9

By Sir William Wilson Hunter






Sir William Wilson Hunter

बंगाल का इतिहास लिखते हुए इतिहासकारों ने मुर्शिदाबाद के सम्वन्ध में बहुत कुछ लिखा है और स्वाभाविक रूप से उसमे शहरवाली जैन समाज उसके व्यक्तियों, मंदिरों एवं अन्य सामाजिक कार्यों का जिक्र आया है. इन्ही इतिहासकारों में से एक सर विलियम विल्सन हंटर ने "ए स्टैटिस्टिकल एकाउंट ऑफ़ बंगाल" (भाग १ से २०) नाम की पुस्तक लिखी जो की सन १८७५ से १८७७ के बीच प्रकाशित हुई. यह एक प्रकार से ब्रिटिश सर्कार का दस्तावेज भी है. इस किताब के भाग ९ में मुर्शिदाबाद जिले का विस्तृत वर्णन एवं सांख्यिकी विवरण है. 


यह पुस्तक अभी मेरे हाथ लगा है और मैंने इसे पढ़ना शुरू किया ही है. इस पुस्तक में २२ जगह अजीमगंज, ६ जगह जियागंज, २२ जगह जगत सेठ, ६ जगह राय धनपत सिंह, दो जगह लक्ष्मीपत सिंह, दो जगह ओसवाल, एवं १५ जगह जैन शब्द का उल्लेख मिलता है.


मुर्शिदाबाद के शहरवाली जैन समाज के इतिहास को जानने में यह पुस्तक बेहद उपयोगी है और "बंगाल के जैन मंदिर: एक शोध परियोजना" में अत्यंत सहायक है. इस पुस्तक के अध्ययन के बाद जो भी तथ्य सामने आएगा उससे सभी को यथा समय अवगत कराया जायेगा. अपने समाज के इतिहास में रूचि रखनेवालों के लिए सन्दर्भ के रूप में निम्नलिखित जानकारी दे रहा हूँ. 

इस पुस्तक के पृष्ठ संख्या २९, ४६, ५८, ८३, ८४, ८६, ९१, १४१, १४३, १४४, १४५, १४६, १४७, १४८, १५६, १५८, १६८, १६९, १७०, १७१, २१२, एवं ३७७ में "अजीमगंज"पृष्ठ संख्या २९, ४९, ८३, १४२, १६७, एवं ३८१ में जियागंजपृष्ठ संख्या ४९, ५२, ५८, १७६, १७९, १८०, १८१, १८३, १९२, २५२, २५४, २५५, २५६, २५७, २५८, २६०, २६१, २६२, २६३, २६४, २६५, एवं ३८१ जगत सेठपृष्ठ संख्या १३९, १४७, १७१, २१२, २४७, २४८ में राय धनपत सिंह, पृष्ठ संख्या ४३ एवं ८३ में ओसवाल शब्द का उल्लेख मिलता है.


नोट:  बंगाल के जैन मंदिर: एक शोध परियोजना के परियोजना निदेशक जैन इतिहास विशेषज्ञ डॉक्टर शिवप्रसाद जी इस समय अजीमगंज में हैं और तथ्यों का संग्रह कर रहे हैं, इसके बाद वो कोलकाता आएंगे। सभी से निवेदन है कि उन्हे सहयोग प्रदान करें. यदि आपके पास बंगाल के जैन के जैन मंदिर, उपाश्रय,  भोजनशाला, अतिथिशाला, धर्मशाला, जैन समाज के स्कूल, कॉलेज, अथवा इनके संस्थापक परिवारों के बारे में कोई ऐतिहासिक जानकारी या सुचना हो तो उन्हें अवश्य प्रदान करें. 

Jyoti Kothari
Proprietor, Vardhaman Gems, Jaipur, representing Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is a Non-resident Azimganjite.

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बालूचर एवं बालूचरी साड़ी



बालूचर एवं बालूचरी साड़ी 

बालूचरी साड़ी - गीता का उपदेश 

बालूचरी साड़ी -युद्ध का दृश्य 
बंगाल की सुप्रसिद्ध साड़ी बालूचरी, ढकइ मलमल जैसी ही इसकी भी ख्याति थी.  इसका नाम बालूचर से पड़ा. बालूचर मुर्शिदाबाद जिले के अंतर्गत एक समृद्ध शहर था. बालू अर्थात रेत, भागीरथी (गंगा) बंगाल में आते आते अपनी गति खो देती है और जगह जगह से सुख जाती है जिससे वहां पर रेत इकट्ठी हो जाती है. नदी के ऐसे भाग को स्थानीय भाषा में "चर" कहते हैं. बालू का चर होने से उस स्थान का नाम बालूचर हो गया था. ५० वर्ष पहले तक रेत का चर पड़ता था और उसे मैंने भी देखा है. फरक्का बांध बनने के बाद भागीरथी का प्रवाह बढ़ गया और "चर" समाप्त हो गया है.

बालूचरी साड़ी का इतिहास लगभग ५०० वर्ष पुराना है. बंगाल के तन्तुवाय (ताँति) अपनी दक्षता के लिए विख्यात रहे हैं. उनकी दक्षता का एक निदर्शन बालूचरी साड़ी भी है. अत्यंत दक्ष शिल्पी कड़ी मेहनत से इसे बनाते हैं. एक साड़ी बुनने में लगभग एक सप्ताह का समय लग जाता है जबकि इतने समय में १० साधारण साड़ी बनाइ जा सकती है. इसकी विशेषता इसकी पल्लू है. चौड़े पल्लू में रामायण, महाभारत, गीता आदि की कहानी दर्शाई जाती है.
बालूचरी साड़ी- नृत्यांगना 

बालूचरी साड़ी
मुर्शिदाबाद अपने रेशम के लिए भी प्रसिद्द था और यह साड़ी रेशम के धागों से बनी जाती थी. रेशम स्वयं एक महँगी वस्तु है. बालूचरी साड़ी में इसके साथ कला और परिश्रम का संगम है. स्वाभाविक है की यह बहुत महँगी होगी. पुराने समय से ही रजवाड़े, जमींदार, एवं अभिजात वर्ग की स्त्रियां इसे पहनती थी. शहरवाली समाज एक संपन्न समाज था और कला का कद्रदान भी, अतः इस समाज में बालूचरी साड़ी का लोकप्रिय होना स्वाभाविक था.
बाद में यह रेशम के साथ साथ सूती धागों से भी बनने लगा और तब इसकी कीमत भी कम हो गई. कालक्रम में मुर्शिदाबाद की यह कला यहाँ से लुप्त हो गई और अब यह विष्णुपुर में व्यापक रूप से बनने लगा है. रेशम कीड़े को मार कर बनता है इसलिए अहिंसा प्रेमी जैन परिवारों में विशुद्ध रेशम से परहेज किया जाता है. परन्तु सूती बालूचरी शहरवाली समाज में आज भी लोकप्रिय है.

नोट: संभवतः पुराने समय में अजीमगंज और जियागंज सम्मिलित रूप से बालूचर कहलाता था. बाद में नदी ने अपनी राह बदली और अजीमगंज-जियागंज के बीच से बहने लगी. कुछ पुराने मानचित्र इस ओर इंगित करते हैं. यह एक शोध का विषय है.

#Baluchari #Saree #Bengal #Murshidabad

Jyoti Kothari
(Jyoti Kothari is proprietor of Vardhaman Gems, Jaipur, representing Centuries Old Tradition of Excellence in Gems and Jewelry. He is a Non-resident Azimganjite.) 

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