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Monday, April 16, 2012

शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की भाषा भाग 5


शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की भाषा भाग ५


१. आज एकदम छुचा पानी दूध आया है. ऊपर से दुधबाला आजकल फाउ भी देने नै मांगे।
२. परसु जीमन में पंतुआ बनेगा. 
३. नन्ही फुच्ची भुआमा भागलपुर गईं. 
४. आम को झांपी से ढांक दीजो नई तो मक्खी बैठेगी.  
५. आजकल गंगाजली गउं कहाँ आवे?
६. दाई नौकर लोग के लिए उष्णा चावल बनता था.
७. जैनी लोग अरुआ चावल खाए.
८. गोयेंठे के आंच में बाटी बढ़िया सिकेगा. 
९. दुनिया भर का ओदा खोदा करता रये किन्तु निज का ठिकाना नई है. 
१० बिना चमाइन के जापा कैसे होगा?
११ बऊ के भौत छुचि बाई है. 
१२ खुन्ति से खुरच खुरच के तब साफ़ किया तब कहीं जाके साफ़ हुआ.

शहरवाली बोली के कुछ और उदहारण: मुर्शिदाबाद की भाषा भाग ४

शहरवाली शब्दों का वाक्यों में प्रयोग: मुर्शिदाबाद की बोली भाग ३

शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की बोली भाग २

शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की बोली भाग १
 
शहरवाली शब्दकोश (शब्दावली) Murshidabad dictionary


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Thursday, February 2, 2012

शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की बोली भाग २


शहरवाली शब्दों का वाक्यों में प्रयोग: मुर्शिदाबाद की बोली के कुछ और उदाहरण   पास में उसके हिंदी अर्थ भी दिए गए हैं. 

सूरज कल खाईस था. : सूरज ने कल खाया था.

उषा तो इ काम किस इ नइ. : उषा ने ये काम किया ही नहीं.

शुधा हम को चिनिस नइ. : शुधा ने मुझे पहचाना नहीं.

तुम उसको बोलियों थो?:   तुमने उसे बोला था?

राजा कल कोई काम नई करिस था. : राजा ने कल कोई काम नहीं किया था.

सभी पाठकों से अनुरोध है की वे अपनी ओर से इस ब्लॉग में कुछ जोड़ते रहें. इस से मुर्शिदाबाद  की संस्कृति को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी. इस ब्लॉग में जोड़ने के लिए कृपया मुझे jyoti _kothari @yahoo.com  में मुझे मेल करें. कृपया इस ब्लॉग को "Follow "  करें जिससे हर नई जानकारी आप तक सहजता से पहुच सके. "Follow " करने के लिए ब्लॉग के दाहिने हिस्से में "Follow " पर क्लिक करें.

शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की बोली भाग १
 
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Wednesday, February 1, 2012

शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की बोली


शहरवाली शब्दों का वाक्य प्रयोग: मुर्शिदाबाद की बोली के कुछ उदाहरण   पास में उसके हिंदी अर्थ भी दिए गए हैं.

हम हिंयां से चट्टी पहन के इ पार से ऊ पार नउके में चप के जाङ. : मैं यहाँ से चप्पल पहन कर इस पार से उस पार जाऊंगा.

हूँआँ नमके हम कलाई का कचौड़ी खाङ.: वहां उतर कर मैं उड़द की कचौड़ी खाऊंगा.

नउके में सुतने का भी है.: नाव में सोने की व्यवस्था भी है.

बाईजी ड्योंठा बनाईस है ऊ बँटे में है.: मिश्रानी ने मठरी बनाई है, वो कटोरदान में है.

बीबीजी सपरिआम, कौंला और बोड़ का राड़ी लामङि.: ननद अमरुद, संतरा, और बेर की राईड़ी लायेंगी.
 
एक ठो खाने का खालो.: एक मिठाई खा लो.

आज कद्दू बूट के दाल का तरकारी बनेगा.: आज घिया चने के दाल की सब्जी बनेगी.

करछुल से निकालोगे की चीमचे से?: करछी  से निकालोगे या चम्मच से?

छाते के खिचड़ी में अम्बल पानी का क्या काम है?:  कमल गट्टे की खिचड़ी में इमली की चटनी क्या जरुरत है?

जीमन होगा तो नाली और गमला  लगेगा.: जीमन होने पर पानी की झारी और तसले की जरुरत पड़ेगी.

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Friday, January 14, 2011

हिंदी वेब पन्नों की सूचि

मैंने इस ब्लॉग में अंग्रेजी एवं हिंदी दोनों भाषाओँ का प्रयोग किया है. कुछ लोग हिंदी पढना पसंद करते हैं तो कुछ लोग अंग्रेजी. दोनों ही प्रकार के पाठकों को ध्यान में रखते हुए इस ब्लॉग को लिखा जाता रहा है. जो लोग हिंदी पढना पसंद करते हैं उनलोगों के सुविधार्थ यहां हिंदी वेब पन्नों की सूचि दी जा रही है. मुर्शिदाबाद एवं शहरवाली समाज को जानने के लिए ये पन्ने उपयोगी हो सकते हैं. कृपया निचे दिए गए लिंक्स पर क्लीक करें.

 

 

मुर्शिदाबाद में आम की किस्में

शहरवाली समाज में आम खाने की कला

मुर्शिदाबाद की विरासत बचाने का प्रयास: मुर्शिदाबाद हेरिटेज डेवलपमेंट सोसायटी

अजय बोथरा एवं रविन्द्र श्रीमाल तुलापट्टी, पंचायती मंदिर कोलकाता के लिए निर्वाचित

अजीमगंज श्री नेमी नाथ स्वामी स्तवन

अजीमगंज दादाबाडी में खात मुहूर्त व शिलान्यास भाग 2

अजीमगंज दादाबाडी में खात मुहूर्त व शिलान्यास भाग १

अजीमगंज दादाबाडी में भैरव जी का उत्थापन








कुछ रीति रिवाज़: जापा और जनम 
 
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Tuesday, December 28, 2010

शहरवाली समाज में आम खाने की कला

मुर्शिदाबाद आमों के लिए प्रसिद्ध है. यहाँ जितने प्रकार के आम मिलते हैं उतने और कहीं नहीं. यहाँ के नवाबों व रईसों ने आम की अनेक स्वादिष्ट एवं सुगन्धित किस्में विकसित करवाई. यहाँ के आम बड़े नाजुक किस्म के होते हैं. शहरवाली  समाज आमों का बड़ा शौकीन था व आज भी है. यहाँ आम खाना एक कला के रूप में विकसित हो गया था. सिर्फ आम खाना ही नहीं परन्तु आम को तैयार करना भी एक कला था.

आम को पेड़ों से यूँ ही नहीं तोडा जाता था. आम तोड़ने में भी नजाकत थी. इसके लिए एक लम्बे बांस एवं हंसिया ( धारदार ) .का  उपयोग  किया  जाता  था. हंसिये के ठीक नीचे बांस में एक छिका बंधा होता था. पेड़ से टूटने पर आम उस छिके में आ जाता था. छिके का प्रयोग आम को जमीं पर गिरने से बचाने के लिए होता था. आम को पेड़ से कच्चा ही तोडा जाता था. उन आमों को फिर एक टोकरी में सजाया जाता था व बीच बेच में आम के पत्ते डाल दिए जाते  थे जिससे एक आम को दुसरे आम से रगड़ न लगे. रगड़ लगने से आम दागी हो जाता था.

टोकरी में रख कर आमों को घर लाया जाता था और उसे बड़ी हिफाज़त से पकाया जाता था. सामान्यतः आमों को लकड़ी के पाटे पर पत्तों के ऊपर एक एक कर बिछा देते थे एवं उसके ऊपर फिर से पत्ते ढक देते थे. समय समय पर उन आमों को ऊपर नीचे पलता जाता था जिससे वो आम चरों तरफ से बराबर व सही तरीके से पक सके. पके हुए आमों को कई घंटों तक पानी में भिगो कर रखते थे जिससे उसके अन्दर की गर्मी निकल जाये. इस क्रिया से आम स्वास्थ्य वर्धक व स्वादिस्ट एवं शीतल हो जाता था.

शहरवालिओं को आम छिलने में महारत हासिल थी. आम को पहले एक तरफ से छिला जाता था. छिलने के बाद आम के गुदे के ऊपर चक्कू से निशान बनाया जाता था व उसके बाद उसे बनाया जाता था. एक तरफ से आम के फांक निकल लेने के बाद ही उसे दूसरी तरफ से छिला जाता था. इस से आम काला नहीं पड़ता था व उसकी सुन्दरता बनी रहती थी.

परंपरागत रूप से घर के बड़े व मर्दों को गुठली नहीं दी जाती थी. प्रायः कर के घर के बच्छे गुठली चुसना पसंद करते थे या फिर उसका अमरस बनाने में उपयोग कर लिया जाता था.

आम के मौसम में नाते रिश्तेदारों के यहाँ आम भेजने की भी प्रथा थी. इस प्रकार एक दुसरे के यहाँ आमों का आदान प्रदान भी होता था. अपनी अपनी हैसियत के अनुसार कम या ज्यादा आम भेजे जाते थे.

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Tuesday, November 2, 2010

मुर्शिदाबाद की विरासत बचाने का प्रयास: मुर्शिदाबाद हेरिटेज डेवलपमेंट सोसायटी


 मुर्शिदाबाद हेरिटेज डेवलपमेंट सोसायटी की स्थापना मुर्शिदाबाद की विरासत बचाने  का एक प्रयास है. प्राचीन काल में मुर्शिदाबाद का क्षेत्र गौड़ के नाम से जाना जाता था. औरंगजेब के सिपहसालार मुर्शीदकुली खान ने इसे बसाया एवं ढाका के स्थान पर सन १७०४ में इसे बंगाल, बिहार, एवं उडिस्सा की राजधानी बनाया. जब मुर्शीद कुली खान यहं आये तो उनके साथ उनके परम मित्र जगत सेठ मानकचंद गेलडा को भी साथ लाये. जैनों के उत्कर्ष का काल यहाँ पर तभी से शुरू हुआ.
यह नवाबों के शहर के नाम से भी जाना जाता रहा.

मुर्शीदकुली खान के बाद नवाब  अलीवर्दी खान, नवाब सुजाउद्दीन आदि ने नवाब की गद्दी संभाली. सिराज़ुद्दौला मुर्शिदाबाद के अंतिम स्वतंत्र नवाब हुए. मुर्शिदाबाद मुग़ल एवं ब्रिटिश शक्तियों के वीच युद्ध स्थल बना. पलाशी के युद्ध में सिराज़ुद्दौला के सेनापति मीर जाफर की गद्दारी के कारन उन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी के क्लाइव लोयेड के हाथों पराजित होना पड़ायहीं से भारत में ब्रिटिश शासन की नींव पड़ी.      


 अंग्रेजों ने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से बदल कर कलकत्ते को बना लिया लेकिन मुर्शिदाबाद की गरिमा फिर भी बनी रही. मुर्शिदाबाद अपनी कलाप्रियता के लिए जाना जाता रहा.


मुर्शिदाबाद के अजीमगंज एवं जिआगंज में रहने वाले जैन धर्मावालम्वी ओसवालों ने यहाँ की संस्कृति में रंग भरने में अपना विशिष्ट योगदान दिया. यहाँ के जैन धर्मावलाम्वी शहरवाली के नाम से प्रसिद्द हुए.यहाँ की कला, संस्कृति, स्थापत्य आदि की उन्नति में शहरवाली समाज का योगदान कल्पनातीत है.

शहरवाली समाज के लोग उच्च शिक्षित, राईसधनवान होने के साथ ही धर्मात्मा भी थे. अनेकों जिन मंदिर एवं दादाबाड़ी उनकी धर्मं परायणता का उदहारण है. शहरवाली समाज द्वारा स्थापित अनेक विद्यालय, महाविद्यालय जहाँ उनकी शिक्षा एवं ज्ञान के प्रति रूचि दर्शाती है वहीँ उन लोगों के द्वारा स्थापित चिकित्सालय उनकी परोपकारिता को.

यहाँ के जैन मंदिर एवं कोठियां शहरवाली समाज के अतीत गौरव की याद दिलाती है. यह एक धर्मं प्राण समाज है एवं अनेक दीक्षाएं इस बात कीगवाह है. अजीमगंज व जियागंज से अनेक साधू - साध्वियां भी हुई हैं.
शहरवाली पोषाक  की अपनी अलग विशेषता है.  अजीमगंज शहरवाली साथ का खानाभी अपनी विशिष्टताओं से भरपूर है. इनकी विविधता भी निराली है. शहरवाली समाज के रीती रिवाजों में भी यहं की माती की सुगंध है.
क्रमशः.........
 अजीमगंज श्री नेमी नाथ स्वामी स्तवन

Launching Murshidabad Heritage Development Society

Images Murshidabad Heritage Development Society

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Thursday, July 30, 2009

सिलामी व व्याह भाग 2



रीति रिवाज़: सिलामी और व्याह भाग १  से आगे :

उस समय शादी कम उमर में ही हो जाती थी लेकिन लड़की पियर में ही रहती थी। थोडी बड़ी होने के बाद (मुख्यतः मासिक धर्मं होने के बाद) लड़की को बिदा किया जाता था एवं उसके बाद ही लड़की ससुराल जाती थी। पीहर से बिदा होने की यह रश्म सावन के महीने में ही होती थी इसलिए इसे सावन मोकलाई कहते थे। मोकलाई का अर्थ मारवाडी भाषा में भेजना होता है।

अजीमगंज के बड़े मन्दिर में एक खाता रखा जाता था जिसे केसरिया व्रत का खाता कहते थे। इस खाते में शादी से संवंधित सभी बातें दर्ज की जाती थी। इसमें वर वधु के नाम, माता-पिता, पता आदि सभी बातें दर्ज होती थी। शादी के अवसर पर लड़के वालों से एक निश्चित शुल्क ले कर ही इस खाते में नाम दर्ज किया जाता था। उस राशि में मन्दिर, गुरूजी (यती जी), मन्दिर के पुजारी अदि सभी का हिस्सा होता था। एक प्रकार से यह विवाह की रजिस्ट्री होती थी।

शादी के बाद विदा करते समय लड़की को डोली में बैठा कर भेजा जाता था। इस डोली को झपानक कहते थे। उस समय की औरतें एवं लड़कियां अक्सर झपानक में ही कहीं आया जाया करती थीं। साधारण स्थिति वाले लोगों के यहाँ झपानक नहीं होने पर कोठियों मंगवा लिया जाता था। कुछ समय पूर्व तक राजवाडी (राजा विजय सिंह जी दुधोरिया) में एक झपानक था।

विशेष द्रस्टव्य: ये सारी जानकारी मुझे श्री अशोक सेठिया से मिली है एवं इसके लिए मैं उनका आभारी हूँ।
यदि आपके पास भी अजीमगंज-जियागंज शहरवाली समाज के वारे में कोई जानकारी हो तो हमें लिखना न भूलें। उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित किया जाएगा।

रीति रिवाज़: सिलामी और व्याह भाग २ 
ज्योति कोठारी 
प्रस्तुति:
वर्धमान जेम्स



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Monday, March 30, 2009

रीति रिवाज़: सिलामी व व्याह १


लड़का लड़की के बड़े होने पर लगभग माँ बाप या घर के बड़े शादी तय करते थे। अक़्सर लड़का या लड़की ख़ुद पसंद नही करते थे। शादी में खानदान को बहुत महत्व दिया जाता था पैसे को नहीं। खानदान के अलावा लड़की का चाल चलन और सुन्दरता को महत्व देते थे। अगर थोडी उमर होने के बाद व्याह होता था तब लड़के की कमाई देखी जाती थी। लड़के की सुन्दरता को ज्यादा महत्व नही दिया जाता था। व्याह के पहले लड़के लड़की की कुंडली जरूर मिलवाई जाती थी और कुंडली मिलने पर ही सम्बन्ध किया जाता था नही तो नहीं। अजीमगंज में खानदानी पंडित जी थे। कुछ समय पहले तक पंडित देव नारायण जी शर्मा थे, जो ज्योतिष के अच्छे जानकर थे। उस समय पंडित जी के खाते में अजीमगंज-जियागंज व आसपास के जैन, पांडे व नाइ के यहाँ होने वाले प्रत्येक व्यक्ति के जन्म का व्यौरा रखा जाता था।

व्याह पक्का होने के बाद किसी भी कारण से छोड़ा नहीं जाता था। पक्का होने के कुछ दिन बाद सगाई की जाती थी जिसे शहरवाली में सिलामी पड़ना बोलते थे। सिलामी में सवा मन दूध और मिश्री लड़की वाले लड़के वाले को भेजते थे जिसे पुरे समाज में बांटा जाता था। सिलामी में विशेष लेन देन का रिवाज़ नहीं था।


रीति रिवाज़: सिलामी और व्याह भाग २ 
ज्योति कोठारी 


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कुछ रीति रिवाज़: जापा और जनम


शहरवाली में जनम से ले कर मृत्यु तक अनेकों रीति रिवाज़ प्रचलित थे। वहां लगभग हर घर में जापा घर होता था एवं बच्चे का जन्म वहीँ होता था। दाई जापा करवाती थी। वोही जच्चा बच्चा को कड़वे (सरसों) तेल से मालिश करती थी। वहाँ कड़वे तेल का दीपक २४ घंटे जलता रहता था। उस दीपक से काजल बना कर जच्चे बच्चे को लगाया जाता था। दरवाजा और खिड़की बंद रहता था। एक महीने तक उस कमरे में कोई भी मर्द नहीं जाता था एवं जच्चा बच्चा बाहर नहीं निकलता था। कोई भी ठंडा चीज यहाँ तक की कच्चा पानी भी नही पीने देते थे।
कभी दाई से जापा नही करवाने पर अस्पताल में भी जापा होता था तब पालकी में बैठा कर अस्पताल ले जाते थे और अस्पताल से वापस आ कर फिर उन्हें जापा घर में ही रखा जाता था।

जापे का खाना अलग बनता था जिसमे सौंठ, अजवायन, गोन्द, मखाने, बादाम और घी का बहुत प्रयोग होता था। जच्चे को अछ्वानी और बच्चे को जनम घुंटी दिया जाता था। साँची पान में छुहारा और अजवायन डाल कर जच्चे को खिलाया जाता था। बिमारी होने पर कबिराजी (वैद्यकी) दवाएं दी जाती थी। कम से कम ६ महीने तक बच्चे को माँ का दूध ही पिलाया जाता था।

बच्चा एक महीने का होने पर मन्दिर में स्नात्र पूजा करवाया जाता था। माँ व बच्चे को सब से पहले मन्दिर ले जा कर दर्शन करवाया जाता था। एक महीने बाद स्नान कर के जब बच्चा बाहर आता था तब माँ को लाल साड़ी व ओधनी पहना कर नेक चार किया जाता था। नेक चार में नाइन व पड्यानी की बहुत भूमिका होती थी। लड़के का एक महिना और लड़की होने पर सवा महीने का सूतक रखा जाता था।

पंडित जी से कुंडली बनवाई जाती थी और कुंडली के अनुसार नाम रखा जाता था। देव नारायण शर्मा वहां के प्रसिद्ध पंडित थे,जो ज्योतिष के अच्छे जानकर थे। उस समय पंडित जी के खाते में अजीमगंज-जियागंज व आसपास के जैन, पांडे व नाइ के यहाँ होने वाले प्रत्येक व्यक्ति के जन्म का व्यौरा रखा जाता था। यह एक प्रकार से जन्म की रजिस्ट्री होती थी जिसे कोर्ट में भी मान्यता प्राप्त थी। आवश्यकता होने पर इस खाते को कोर्ट में पेश किया जाता था। मैंने ये खाते देखे हैं जिनमें लगभग संवत १८४० से २००० अर्थात इस्वी सन १७८५ से ले कर १९५५ तक के सभी जन्म का संक्षिप्त व्यौरा दर्ज है। इसमें पिता का नाम, जन्म का समय, तारीख, संवत, नक्षत्र व संतानोत्पत्ति का क्रम दर्ज है।

छूना (M.C) होने पर भी जनाना लोग जापा घर में रहती थी। वहां पर इस चीज का बहुत विचार था।

रीति रिवाज़: सिलामी और व्याह भाग २ 
ज्योति कोठारी 

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Saturday, December 20, 2008

कुछ निराले शहरवाली नाम

अजीमगंज के शहरवाली समाज में कुछ निराले नाम प्रचलित थे । इस प्रकार के नाम और कहीं भी देखने में नहीं आते हैं । कुछ नाम जो मुझे याद है उन्हें यहाँ पर लिख रहा हूँ। यदि आप लोगों को ऐसे कोई भी नाम और मालुम हो तो मुझे लिखने का कष्ट करें। अजीमगंज-जिआगंज-मुर्शिदाबाद के शहरवाली साथ के बारे में और भी कुछ जानकारी आप के पास हो तो जरूर मुझे बताएं। धन्यवाद।
नामावली:
पुरूष: घोंता, हुत्तु, नाडू, बेटा बाबु, नत्थू, गोलू, गोल, लोंदु, पोदु, खुद्दु, बुढा, फुचुआ, फत्तू, फुत्तुस, छेदु, चुलू, टुलू, उदु, सुदु, दुदू, कुमरू, हामू, झामू, बाह्जी, जर्मन, जापानी, हाबू, बाबू बच्चा, मिस्टर बाबू, पीला बाबू, लाल बाबू, नया बाबु, खोली भट्टाम, सिंटू, मिंटू, चीनी बाबू, लाली बाबू, बाबू राजा, बन्नू बाबू, तन्नु बाबू, लाख दो लाख।

स्त्री: लाडा, पाडा, पुप्पी, लोजेंस, बाण मति, मोंचुरिया, बीबी, रुबू, हांसी, छोटी मुन्नी, रानी मुन्नी, नन्ही मुन्नी, फुच्ची, नन्ही फुच्ची, खेंतो.


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